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प्रेम-पंचमी
सपादक श्रीदुलारेलाल -भागव € सुधान्संपादक ) ५
पढ़के योग्य उत्तकोक्तक्न उपन्यास आर कहाकियाँ
रंगभूति ( दोनों भाग ) ६), ६) | थीचे पढित १॥)
“बहता हुआ फूल. २॥), ३) | अबला १), १॥) हृदय की परख 3), 0) | सधुपर्क १॥), २) चित्रशाला (दो भाग ) ३१), ४४ | सा ( दो भाय ) ३), ९) हृदय की प्यास १॥), २) | कर्स-सार्ग जयभग १॥) मिस्वर व्यास की कथा २॥), ३) | छेन 5), 3१8) मंदन-निर्कुंज ॥), 9)) | शअप्सरा लगभग १॥) प्रेम-प्रसून (प्रेमचंद) १८), १॥८) | गिरियाज्ञा १), १॥) गढ़-कुंडार ४. २॥), 3) | कमं-्फल १११), २॥) प्रेमनगंगा १), $॥) तूलिका ३।), १॥॥) गोरी 3), १0) | अश्रुपात्त १), १॥) मंजरी १9, १॥)) | जासूस की ढात्ली. १0), २) फ्सन १॥)), २१) | विचित्र योगी १), १॥) जब सूर्योदय होगा १), १७) | पदित्न पापी ३) १७) विदा २॥), ३) | रूव्युंजय 0), १.) भाई जगभग १) | पाप की ओर 3), १॥) प्रेम-परीक्षा ॥77 १४५ | पतितोद्धार 352)
सब प्रकार की पुस्तकें मिलने का पता--
संचालक गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय, लखनऊ
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कै के प्रेमचंद [ रगभू।मि, कबला, प्रेम-प्रसून, ग्रम-द्वादशी, प्रेम-बत्तीसी, 5 प्रमन्पत्चीसी, प्रमाश्नस, सेवा-सदन, प्रेम-पूरणिमा, । सप्तसराज, नवानिधि, कायाकल्प, वरदान । ४
प्रतिज्ञा आदि के रचयेता ,]
प्रकाशक गंगा-पुस्तकमाला-कार्या क्षय प्रकाशक ओर विक्रेता
ढछाखनऊ
प्रथमाछत्ति
€ ८ा:2:८7५:::५ ४ ६> था # भायाहाता ७ अरमामकाकातआ, ६
खलजिरदु 3१) ) स॒० $श८७ वि० [ सादी ॥) न्श्ु
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प्रकाशक श्रीदुक्ञारेज्ञाल भागव अध्यक्ष गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय लखनऊ 24 3 झुद्रक श्रीदुलारेज्ञाल भागेव अध्यक्ष गंगा-फाइनआद-प्रेस लखनऊ
भूमिका
संसार में जिस दिन दादी और उसके नाती-पोतों का श्राविष्कार हुआ, उसी दिन कहानी का भी जन्म हुआ | कट्टानियों का दादी और बच्चों के साथ अ्रहूट सबध है । बच्चों को विना कहानी सुने नींद नहीं आरती, और दादी को बिना कहानी सुनाए चैन नहीं पढ़ता । इसीलिये शायद कष्टानी का आदिम इतिहास अज्ञात है । उप्तका सबसे प्रथम प्राभास हमे संसार के सभी देशों में प्रचक्तित दंत- कथाओं तथा घामिक साहिस्य में मिजता है । बूढ़ी दादी के समान डी ये घामिक भ्रथ भी अजान सानव-समाज को कहानियाँ सुना- सुनाकर सीधा रास्ता बतलाने का प्रयत्न किया करते हैं । हमारे देश के शाख और पुराण, महाभारत और रामायण, सभी प्राचोन स्रंथ कहानियों से भरे पडे हैं । हन सब अनत कथाओं का एक-सात्र उद्देश्य है अजश्ञानी और अवोध मलुष्य-समान को शिक्षित बनाना। कष्ठानी का यह महत्व-पूर्ण उपयोग हसारे देश में बहुत पहले से ही चक्ना श्राया है ! दादी की कहानियाँ भी प्राय इसी उद्देश्य फो लेकर कही जाती थीं । क्योंकि बाककों छी अपरिपक्त मनोदृत्तियों को सुमार्ग में प्रवृत्त करने के लिये कह्दानी ही सबसे उत्तम साधन माना ,जाता था। आज दिन भी भारतीय तथा पाश्चारय शिक्षा-प्रयाद्वी में कहानी का ही शिशु-शिक्षा का सर्वोत्तम माध्यम समझा जाता है। यातकों के लिये लिखी गईं सभी पुस्तक---गणित-जेसे रूखे विषय की भी--कहानियों से भरी रहती हैं । मनोरंजन के साथ शिक्षा-प्रदान करने के लिये कट्टानी से बढ़कर साधन संसार ने श्रब तक नहीं डूँढ़ पाया ।
(६)
भाषा श्ौर लेखन-शेक्षी की शिक्षा के लिये भो कहानी एक अत्यवत उपयोगी साधन समभी गई है । उसझे द्वारा वाह्षकों को साहित्य के प्रायः ,सभो श्रगों की वारीडियों का ज्ञान छराया जा सकता हे । एक भच्छी कहानी में नाटक के लिये उपयुक्त कथोप- कथन, उपन्यास के लिये उपयोगी चरिच्न-घित्रण, थाव्य क# उपयुक्त चस्तु वर्णन तथा उत्तम निबंध के लिये लाभदायक विचार-पिश्नाद् बढ़ी आसानी से मिल सकते ६ । उत्तमात्तम लेखकों छो कह्दानियों के अध्ययन से सापा के परिसाज्ित रूप, उसके लिये श्रावश्यक प्रोनः- पूर्ण सथा सनयोचिल शब्दावत्ली के संगठन झौर भाव व्यंजना के अनुरूप लेशन-शैज्ी भ्रादि छा पूरा ज्ञान हो सकता है। पाउशालाझं में पढनेवाज्े विद्याथियों को भाषा, साहि!य तथा शैली का आवश्यक बोध कराने के क्षिये तो फहानी से बढ़कर दूसरा साधन ही नहीं । उनके शस बड़े बड़े आचायों द्वारा लिखे हुए निरबंधों, उपनन््यासों सथा नाटकों को पढ़ने के लिग्रेसमय ही नहीं होता + इसके भतिरिक्त प्रति दिल पढ़ाए जानेवाले श्रेणी-पाठ के लिये बड़ेन्चड़े नाटक, उपन्यास भी अनुपयुक्त सिद्ध हुए हें | बालकों से स्थगित कथा-ऋस्तु हे लिये प्रतीक्षा करने का भाव बहुत क्रम हुझा करता है। वे एक जार में ही, एक सॉँस सें ही, पूरी कथा सुन लेना चाहते ४ । बासी कथानक में उन्हें ज़रा भी, अभिरुचि नहीं रह जाती। अतए॒व उन्हें छोटो-छोटदी स्वतन्न कथायों द्वारा प्रो हिंदी-साहिस्य को बारीडकियों, भाषा सौष्ठ व तथा साहित्य के झाखायों फी लेखन-होजली का ज्ञान कराज़ा चादिए । कहानियाँ ही उनके लिये सर्वोत्तम माध्यम होती हैं । श्रतएव हमारी सम्मति में हिंदी के आच/ये द्वारा ज्िखी हुई छोट-छोटी कहानियों के संग्रह ही बालकों को भाषा और साहित्कविषयक शिक्षा के लिये उपयोग में ज्वाने चाहिए, प्रचक्षित 'प्रोज्-सेल्ेन्शन! नासधारो सानमठो के-से साहित्यिक पिटारे नहीं । उनसे किसी विषय का
( ७)
सफल ज्ञान होने के बजाय ऐं्रआलिक अति ही अधिक उसपर
होती है । ५ हु 2 इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर हमने हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कह्ठानी- लेखक श्रीयुत सुंशी प्रेमचदजी की सैकढ़ी फद्दानियों का झ्लाद्योडन करने के बाद नवनीत-सम्त यह उनको पाँच सर्वोत्तम कहानियों का सम्नद प्रकाशित किया है | इन कद्दानियों फा सम्रह करने में इसने बाज्ोपयोगिता फो हो सबसे मुख्य क्षच्य रक््खा है | कोई भी फट्टानी ऐसी नहों रक्खो गई, जिसमें व्यथ के लिये राजनीतिक, पचढ़ों को घसीट गया हो । साथन्होी-साथ दांपत्य-प्रेम तथा यौवनोन्माद से संबध रखनेवाली कट्ठानियों सी इमने छोड़ दो हैं, क्योंकि हमारो समझ में वे कोमक्-मति बालकों के क्लिये हानिकर हो हो सकती हें, लाभदायक नहीं । भाषा तथा शैलो को इष्टि से भां ये कहानियाँ _ प्रमचदजी को सर्वश्रेष्ठ कद्दानियों हैं । इनमें उनकी शैज्नी क॑ सभी प्रकारों का समावेश दो गया है। “'झत्यु के पीछे” कह्ानों में प्रमचंदजी को आदश-सष्टि, वर्णन शैज्ञो तथा साथाँ की ऊद्दावोह पूर्ण रूप से प्रकट हुई हैं। "आभूषण! में उतका कथा-वस्तु पर अधिकार पूणतया प्रस्फुटित हुआ है । मनोविज्ञान का अध्ययन भी उसमें ख़्ब विकसित हुआ ई । मध्य श्रणा के हिंदोस्तानी घर का उसमें सजोव चित्र देखने को मिलता है। 'राज्य-भक्तः में ऐेतिदासखिक आधार पर लिखों हुई उन्तकी इस तरह की सर्वक्षेष्ठ कहानी है । लखनऊ के अंतिम नवाबी “दिनों का ख़ाका-सा आँखों के सामने नाचने लगता है । 'अधिकार- खिस्ता” अपने ढग का एक ही कष्ठानो हैं | पशुश्रों फी मनोवृत्ति का बड़ा दी सुंदर अ्रध्ययन तथा प्राकृतिक दश्य-वर्णंन इस कहद्दानी में मिलता है । प्रेमचदजी को भाषा का लोच इस कहद्दाना में पुर्णंतया प्रकट होता है। 'गृह-दाह” हिंदास्तानी घरों में प्रतिदिन दोनेवाक्ते नाटकों का एक इश्य है। झादर्श आतृ-प्रेम का चित्रण जैसा इस,
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कहानी में हुआ है, वैधा शायद अन्यत्न कहीं नहीं दो सक्ता। कथोपकथन ( 7)78]0906 ) का सह्व भी इस कहानी में झ़ूब प्रकट हुधा है ।
इन पाँचों ऋछष्टानियों के एकत्र कर देने में हमारा केवल यही उच्ेश्य है कि वर्तसान दिंदी-साहित्य के प्रधान श्रंगों से परिचित होने ऐे किये हमारे बाज्ञकों को जगइ-जगद न भटकना पड़े, मनोरंजन के साथ-साथ उन्हें उत्तम शिक्षा मिले, श्रौर भाषा और शैक्ती का भनु- करण करने के लिये उनके सासने हिंदी के जन-प्रिय तथा सान्य लेखक की कृति आदुर्श-रूप से उपस्थित हो ।
प्रस्तुत पुस्वक्ष का स्टेंढर्ड हसारी पाठशान्षाओों के सातवें, भारवें, नवें वथा दखवें दर्जे के विद्यार्थियों थी ममता के अनुसार रक्खा गया है, जिससे स्कूल और पाठशात्ताश्ं के विद्यार्थी सी प्रेमचदुजी की विख्यात लेखन-शेलीं से परिचित हो सकें। इसका मेटर भी साल्न-भर में समाप्त हो जाने के दिलाब से ही संग्रह छिया गया है ।
झाशा है, शिक्षान्प्रेमी सजन--विशेषकर हिंदी-साहित्य-सम्मे्न, मदुरास-हिंदी-प्रचार-कार्योत्रन, जालधर-अन्या-मद्दाविद्यालय, गुरुकुल काँगड़ी, गुरुकुब ब॒दांवन, पजाब, यू० पी०, सी० पो*, विद्वार, दिल्ली, राजपूताना श्रादि प्रांतों छी देक्स्ट-बुक-कमेटियाँ, इटरमीडिएट-बो्ड ओर युनिवर्लिटियाँ तथा श्न्यान्य भारतवर्षीय शिक्षा-संध्याएँ--इसारे इस उद्योग से संतुष्ट होंगे, और अपने बातह्यकों और बालिकाओं में इस पुस्तिका का प्रचार बढादेंगे।
श्रीदुल्लारेलाल भाग॑व € संपादक )
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विषय-सूची
" झत्यु के पीछे
- श्राभूषण
« राज्य-भक्त
« भ्रधिकार-चित्ता
ग्ुह-दाह
ड्ष्ठ
२० देर मरे 6६१
प्रेम-पंचमी मृत्यु के पोछले
१
बाबू इश्वरचंद्र को कमवारपओं में लेख लिखने को चाट उन्ही दिनो पड़ी, जब चह विद्याभ्यास कर रहें थे | नत्य नए विषयों की चिता मे ल्लीन रहते । पत्रों मे अपना नाम देखकर उन्हे उससे कही ज्यादा खुशी होती थो, जितनी परीक्षाओं में उत्तीणं होने या कक्षा मे उच्च स्थान प्राप्त करने से | वह अपने कॉलेज के 'गर्म-दत्त” के नेता थे | समाचासपत्रों में परीक्षा-पत्रों की जटिलता या अध्यापकों के अनुचित व्यवहार की शिकायत का भार उन्ही के सिर था । इससे _ उन्हे कॉलेज में नेतृत्व का पद् मित्न गया था। प्रतिरोध के प्रत्येक अवसर पर उन्ही के नाम नेतृत्व की गोटी पड़ जातो थो। उन्हें विश्वास हो गया था कि मे इस परिमित क्षेत्र से निकलकर संसार के विस्तृत ज्षेत्र में अधिक सफल हो सकता हूँ। सावे- जनिक जीवन को यह अपल्ग भाग्य समम बैठे थे । कुछ ऐसा संयोग हुआ कि अभी एम० ०० के परीक्षार्थियों मे उनका नाम निकलने भी न पाया था कि 'गोरव!” के संपादक महोदय ने वान- प्रस्थ लेने की ठानी, ओर पत्रिका का भार इश्वरचंद्र दत्त के सिर पर रखते का निश्चय किया | बाबूजी को यह समाचार मिला,
२ प्रेम-पंचसी तो उछल पड़े । धन्य भाग्य कि में इस सम्मान-पद के योग्य समझा गया ! इसमे संदेह नहीं कि वह इस दायित्व के गुरुत्व से भी भाँति परिचित थे) लेकिन कीर्ति-लाभ के प्रेम से उन्हें बाधक परिस्थितियों का सामना करने पर उद्यत कर दिया । वह इस व्यवसाय में स्वातंत्य, आत्मगौरव, अनु- शीलन ओर दायित्व की मात्रा को बढ़ाना चाहते थे। भारतीय पत्रों को पश्चिम के आदर्श पर लाने के इच्छुक थे। इन इरादो को पूरा करने का सुअवसर हाथ आया । चे ग्रमोल्लास से उत्तेजित होकर नदी मे कद पड़े । (२) इंश्वस्चंद्र की पत्नी एक ऊँचे और घनाव्य कुल की लड़की थी; और ऐसे कुलो की मर्यादर्रयता तथा मिथ्या गौरब-प्रम से संपन्न थी । यह समाचार पाकर उरी कि पति महाशय कहीं इस मंमट से फंसकर क़ानून से मेंह न मोड़ ले | लेकिन जब बाबू साहब ने आश्वासन दिया कि यह काये उनके कानून के अभ्यास मे बाघक न होगा, तो कुछ न बोलो । लेकिन इश्वरचंद्र को बहुत जल्द सारूम हो गया कि पत्र- संपादन एक बहुत हो इर्पा-युक्त काय है, जो चित्त की समग्र वृत्तियों का अपहरण कर लेता है। उन्होंने इसे मनोरंजन का एक साधन और ख्याति-लाभ का एक यंत्र समझा था । इसके द्वारा जाति की कुछ सेवा करना चाहते थे। इससे द्रव्योपाजन का विचार तक न किया था । लेकिन नौका में बैठकर उन्हें
मृत्यु के पीछे अनुभव हुआ कि यात्रा उतनी सुखद नहीं है, जितनी समझी थी | लेखो के संशोधन, परिवद्धन ओर परिवतेन, लेखक- गण से पत्र-व्यवहार, चित्ताकर्षक विषयों की खोज, और सहयोगियों से आगे बढ़ जाने की चिता में उन्हें कानून का अध्ययन करने का अवकाश ही न मिलता था । सुबह को किताबे खोलकर बैठते कि १०० प्रष्ठ समाप्त किए बिना कदापि न उदंगा; कितु ज्यो ही डाक का पुलिदा आ जाता, वह अधीर होकर उस पर टूट पड़ते, किताब खुली-को खुली रह जाती थी। वारंवार संकल्प करते कि अब नियमित रूप से पुस्तका- वलोकन करूँगा; ओर एक निर्दिष्ट समय से अधिक संपादन- कार्य मे न क्ृगाऊँगा | लेकिन पत्रिकाओं का बंडल सामने आते ही दिल काबू के वाहर हो जाता । पन्नो को नोक-मोंक, पत्रिकाओं के तक-वित्तक, आलोचनाअत्यालोचना, कवियों के काव्य-चमत्कार, लेखकों का रचना-कोंशल इश्यादि सभी बातें उन पर जादू का काम करती । इस पर छपाई की कठिनाइयों, ग्राहक-सर्या बढ़ाने की चिता और पत्रिका को स्ोगसुदर बनाने की आकांच्ा आर भी प्रा्यां को संकट भे डाले रहती थी । कभी-कभी उन्हे खेद होता कि व्यथं ही इस भमेले में पड़ा । यहाँ तक कि परीक्षा के दिन सिर पर आ गए, और वह इसके लिये बिलकुल तैयार न थे। उसमे सम्मिलित न हुए । मन को समममाया कि अभी इस काम का श्रोगणेश है, इसी कारण ये सब बाधाएं उपस्थित होती है। अगले वर्ष यद्द
। प्रेम-पंचमी काम एक सुव्यवस्थित रूप मे आ जायगा। और तब में निर्श्चित होकर परीक्षा मे बैठ गा। पास कर लेना क्या कठिन है । ऐसे बुद्ध पास हो जाते हैं, जो एक सीधा-सा लेख भी नहीं लिख, सकते, तो क्या में ही रह जाझँगा । सानको ने उनकी ये बातें सुनीं, तो खब दिल के फफोले फोड़े--'में तो जानतो थी कि यह धुन तुम्हे मटियामेट कर देगी । इसीलिये बार-बार रोकतो थी; लेकिन तुमने मेरी एक न सुनी। आप तो डूबे ही, मु भी ले डूबे ।' उनके पूज्य पिता भो बिगड़े; हितैषियों ने भी सममाया--“असी इस काम को कुछ दिनों के लिये स्थगित कर दो, कानून में उत्तीर्ण होकर निह्वंह देशोद्धार में प्रवृत्त हो जाना ।” लेकिन ।इश्वरचंद्र एक बार मैदान मे आकर भागना निद्य समभते थे । हाँ, उन्होंने दृढ़ प्रतिज्ञा को कि दूसरे साल परीक्षा के लिये तन मन से तेयारी करूँगा ।
अतएव नए वर्ष के पदाणण करते ही उन्होने कानून को पुस्तकें स॑प्रह की, पाव्य-क्रम निश्चित किया, रोजनामचा लिखने लगे, ओर अपने चंचल ओर बहानेबाज़ चित्त को चारो ओर से जकड़ा, सगर चटपटे पदार्थों का आस्वादन करने के बाद सरल भोजन कब रुचिकर होता है। कानून में वे घातें कहाँ, वह उन्माद कहाँ, थे चोटें कहाँ, वह उत्तेजना कहाँ, वह हलचल कहाँ । बाबू साहब अब नित्य एक खो हुई दशा में रहते । जब तक अपने इच्छानुकूल काम करते थे, चौबीस बंटों में घंटे-दो घंटे कानून भी देख लिया करते थे । उस नशे
मृत्यु के पीछे रै
ने मानसिक शक्तियों का शिथित्न कर दिया | स्नायु निर्जीव हो गए । उन्हे ज्ञात होने लगा कि अब में कानून के लायक नहीं रहा, ओर इस ज्ञान ने क़ानून के प्रति उदासीनता का रूप धारण किया । मन मे संतोष-बृत्ति का प्रादुर्भाव हुआ । प्रारब्ध ओर पूव संस्कार के सिद्धांतों की शरण लेने लगे ।
एक दिन मानकी ने कहा--“यह क्या वात है? क्या क़ानून से फिर जी-उचाट हुआ ?”
इश्वरचंद्र ने दुस्साहस-पूर्ण भाव से उत्तर दिया--“हाँ, भई मेरा जी उससे भागता है ।”
मानकी ने व्यंग्य से कहा--“बहुत कठिन है १”
इश्वरचद्र--कठिन नही है; ओर कठिन भी होता, तो मे उससे डरनेवाला न था; लेकिन मुमवकालत का पेशा ही पतित अतीत होता है । ज्यो-ज्यो वकीलो की आंतरिक दशा का ज्ञान होता है, मुझे उस पेशे से घ॒णा होती जातो है । इसी शहर में सैकडों वकोल ओर बेरिस्टर पड़े हुए हैं , लेकिन एक व्याक्त भी ऐसा नही, जिसके हृदय मे दया हो, जो स्वार्थपरता के हाथों बिक न गया हो । छल और धूतेता इस पेशे का मूल- तत्त्व है। इसके बिना किसी तरह निर्वाह नहीं। अगर कोई महाशय जातीय आंदोलन मे शरीक भी होते है, तो स्वाथ- सिद्धि के लिये, अपना ढोल पीटने के लिये। इन लोगों का समग्र जोवन वासना-भक्ति पर अर्पित हो जाता है। दुर्भाग्य से हमारे देश का शिक्षित समुदाय इसी दर्गाह का मुजावर
दर प्रेस-पंचसी
होता जाता है; ओर यही कारण है कि हमारी जातीय संस्थाओं को शीघ्र वृद्धि नहीं होती । जिस काम में हमारा दिल न हो, हम केवल ख्याति और स्वार्थ के लिये उसके कर्णंधार बने हुए हों, वह कभी सफल नही हो सकता । यह वत॑मान सामाजिक व्यवस्था का अन्याय है; जिसने इस पेशे को इतना उच्च स्थान प्रदान कर दिया है। यह विदेशी सभ्यता का निकृष्टवस स्वरूप है कि देश का बुद्धि-बल स्वयं धनोपाजेन न करके दूसरों की पैदा की हुईं दौलत पर चेन करना, शहद् की मक्खी न बनकर चीटी बनना; अपने जीवन का लक्ष्य सममता है ।
सानकी चिढ़कर बोलो--“पहले तो तुम वकीलों की इतनी निदा न करते थे ।”
इश्वरचंद्र मे उत्तर दिया--/“तब अनुसव न था । बाहरी टीम- टास ले वशीकरण कर दिया था ।”
मानकी--क्या जाने तुम्हे पन्नों से क्यों इतसा प्रेम है। में तो जिसे देखती हूँ; अपनी कठिनाइयों का रोना ही रोते हुए पाती हूँ । कोई अपने आहकों से नए ग्राहक बनाने का अनुरोध करता है, कोई चंदा न वसूल होने की शिकायत करता है। बता दो कि कोई उच्च शिक्षा-प्राप्त मनुष्य कभी इस पेशे में आया है। निसे कुछ नहीं सूकता, जिसके पास न कोई सनद् है, न काईं डिग्री, वही पत्न निकाल बैठता है; और भूखों मरने की अपेज्ञा रूखी रोटियो पर ही संतोष करता है। लोग विज्ा- यत जाते हैं, कोई पढ़ता है डॉक्टरी, कोई इंजीनियरी, कोई
स॒त्यु के पोछे ७
सिविल सर्विस | लेकिन आज तक न सुना कि कोई एडीटरी का काम सोखने गया हो । क्यों सीखे ? किसी को क्या पड़ी है कि जीवन को महत्वाकांक्षाओं को खाक मे मिलाकर त्याग ओर विराग में उम्र काटे । हो, जिनको सनक सवार हो गई हो, उन्तकी बात हो निराली है ।
इश्वरचंद्र--जीवन का उद्देश्य केवल धन-संचय करना ही नहीं है ।
मसावकी--अभो तुसने वकीलों को निदा करते हुए कहा; ये लोग दू सरो की कमाई खाकर मोटे होते हैं। पत्र चलाने- वाले भी तो दूसरों की ही कमाई खाते हैं ।
इश्व॒रचंद्र ने बग़ले कॉकते हुए कहा--"हम लोग दूसरों की कमाई खाते है, तो दूसरों पर जान भी देते हैं। वकीलों की भाँति किसी को लूटते नही ।”
मानको--यह तुम्हारो हठधर्सी है। वकील भी तो अपने मुवकिलो के लिये जान लड़ा देते है। उनकी कमाई सी उतनी ही हलाल है। जितनी पत्रवालो की। अंतर केवल इतना है कि एक की कमाई पहाड़ी सोता है, दूसरे की बरसाती नाला | एक में नित्य जल-प्रवाह होता है, दूसरे में नित्य धूल उड़ा करती है। बहुत हुआ, तो बरसात मे घड़ी-दो घड़ी के लिये पानी आ गया।
इश्वर०-पहले तो मैं यही नहीं मानता कि वकीलों की कमाई हलाल है, और मान भी रूँ; तो किसी तरद यह नहीं
घर प्रेम-पंचमी
सान सकता कि सभी वकील फूलों की सेज पर सोते हैं । अपना-अपना भाग्य सभी जगह है। कितने ही वकील हैं, जो मूठी गवाहियाँ देकर पेट पालते हैं | इस देश में समाचार-पत्रों का प्रचार अभी बहुत कम है, इसी कारण पत्न-संचालकों की आर्थिक दशा अच्छी नहीं । योरप और अमेरिका में पत्र चलाकर लोग करोड़पति हो गए हैं । इस समय संसार के सभी समुन्नत देशों के सूत्रधार या वो समाचारपत्रों के संपादक ओर लेखक है, या पत्नो के स्वामी | ऐसे कितने ही अरब- पति है, जिन्होंने अपनी संपत्ति को नींव पत्रों पर हो खड़ी
इंश्वरचंद्र सिद्ध करता चाहते थे कि धन) ख्याति ओर सम्मान प्राप्त करने क॥ पतन्न-संचालन से उत्तम और कोई साधन नही है, ओर सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसी जीवन मे सत्य और न्याय की रक्षा करने के सच्च अवसर मिलते हें । परंतु मानकी पर इस वक्तृता का ज़रा भी असर न हुआ। स्थूल दृष्टि को दूर की चीजे साफ नही दीखती । मानकी के सामने सफल संपादक का कोई उदाहरण न था | ०
(३)
१६ वर्ष गुजर गए। इश्वरचंद्र ने संपादकोय जगत् में खूब नाम पैदा किया, जातीय आंदोलनों में अग्रसर हुए, पुरतकें लिखीं, एक दैनिक पत्र निकाला, अधिकारियों के भी सम्मान- पात्र हुए। बड़ा लड़का बी० ए० में जा पहुँचा; छोटे लड़के
मृत्यु के पोछे अ
नीचे के दरजों में थे। एक लड़की का विवाह भी एक घन- संपन्न कुल मे किया | विद्त यही होता था कि उनका जीवन बढ़ा ही सुखमय है । मगर उनकी आर्थिक दशा अब भी संतोष- जनक न थी। खच आमदनी से बढदा हुआ था | घर की कई हज़ार की जायदाद हाथ से निकल गई, इस पर भी वेंक का कुछ-न-कुछ देना सिर पर सवार रहता था। बाज़ार से भी उनकी साख न थी । कभी-कभी तो यहाँ तक नौबत आ जाती कि उन्हें बाजार का रास्ता छोड़ना पड़ता । अब वह अक्सर अपनी युवा- चस्था को अदूरदर्शिता पर अफसोस करते थे । जातीय सेवा का भाव अब भी उनके हृदय मे तर॑ंगे मारता था; लेकिन काम तो वह करते थे, ओर यश वकीलों ओर सेठो के हिस्सों मे आ जाता था। उनको गिनती अभी तक छुटमैयों मे थी। यछपि सारा नगर जानता था कि यहाँ के सावजनिक जीवन के प्राण वही हैं; पर उनका यथाथ सम्मान न होता था । इन्ही कारणों से इंश्वरचंद्र को अब संपादन-काय से अरुचि होती थी। दिनादिन उनका उत्साह क्षीणु होता जाता था; लेकिन इस जाल से निकलने का कोई उपाय न सूमता था । उनकी रचना मे अब सजीबता न थी, न लेखनी में शक्ति। उनके पतन्न ओर पत्रिका दोनो ही से उदासीनता का भाव मलकता था । उन्होंने सारा भार सहायकों पर छोड़ दिया था; खद बहुत कम काम करते थे । हाँ, दोनो पत्रों को जड़ जम चुको थी, इसलिये ग्राहक-संख्या कम न होने पाती थी । वे अपने नाम पर चलते थे।
१० प्रम-पंचमी
लेकिन इस संघ और संग्राम के काल मे उदासीनता का निबाह कहाँ | “गोरव” क कई प्रतियोगी खड़े हो गए, जिनके नवीन उश्साह ने “गोरव” से बाजी मार ली। उसका बाजार ठंढा द्वोने त्ञगा। नए प्रतियोगियों का जनता ने बड़े हपे से स्वागत किया । उनकी उन्नति होने लगी। यद्यपि उनके सिद्धात भी वही, लेखक भी वहो, विषय भी वही थे; लेकिन आगंतुको ने उन्ही पुरानो बातों में नई जान डाल दी | उनका उत्साह देख ईश्वरचंद्र को भी जोश आया कि एक बार फिर अपनी रुकी हुई गाड़ी मे जोर लगाऊँ ; लेकिन न अपने से सामथ्य थी, न कोई द्वाथ बँटाने- वाला नजर आता था । इधर-उधर निराश नेत्रों से देखकर हतात्साह हो जाते थे । हा | मैने अपना सारा जोवन साब॑- जनिक कार्यों मे व्यतोत ॥कया, खत बाया। सीचा, दिन का दिन ओर रात को रात न समझा धूप मे जला, पानी मे भीगा, और इतने परिश्रम के बाद जब फसल काटने के दिन आए तो मुममे हँसिया पकड़ने का भो बूता नहीं। दूसरे लोग जिनका उस समय कही पता न था, नाज काट-क्राटकर खलिहान भरे लेते हैं, ओर मे खड़ा मुँह ताकता हूँ । उन्हे पूरा विश्वास था कि अगर कोई उत्साहशील युवक मेरा शरीक हो जाता, तो “गोरव” अब भी अपने प्रतिदवद्वियों को परास्त कर सकता। सब्य-समाज मे उनकी घाक जमी हुई थी, परिस्थिति उनके अनुकूल थी। जरूरत केवल ताजे खून की थी । उन्हें अपने बड़े लड़के से ज्यादा उपयुक्त इस काम के लिये ओर कोई न दीखता था । उसको
सृत्यु के पीछे ११
रुचि भो इस काम की ओर थो, पर सानकी के भय से वह इस विचार को जबान पर न ला सके थे। इसी चिता मे दो साल गुज़र गए, ओर यहाँ तक नौबत पहुँची कि या तो “गौरव” का टाट उल्लट दिया जाय, या उसे फिर सँभाला जाय । इश्वर- चंद्र ने इसके पुनरुद्गार के लिये अंतिम उद्योग करने का दृढ़ निश्चय कर लिया | इसके सिवा और कोई उपाय न था | यह् पत्रिका उनके जीवन का स्स्व थो। उसे बंद करने की वह कल्पना भो न कर सकते थे । यद्यपि उनका स्वास्थ्य अच्छा न था, पर प्राण-रक्षा की स्वाभाविक इच्छा ने उन्हे अपना सब कुछ अपनी पत्रिका पर नन््योछावर करने का उद्यत कर दिया । फिर दिन-के-दिन लिखने पढ़ने मे रत रहने लगे । एक कण के लिये भो सिर न उठाते । “गारव” के लेखों मे फिर सजोबता का उद्भव हुआ, विद्वज्जनों में फिर उसको चर्चा होने लगी, सहयोगियो ने फिर उसके लेखों को उद्धृत करना शुरू किया, पत्रिकाओं मे फिर उसको प्रशंसा-सचक आलोचनाएँ निकलने लगी । पुराने उस्ताद को लत्कार फिर अखाड़े से गूंजने लगी । लेकिन पत्रिका के पुनः संस्कार के साथ उनका शरीर और भो जजर होने लगा । हृदू-रोग के लक्षण दिखाई देने लगे । रक्त की न्यूनता से सुख पर पीलापन छा गया | ऐसी दशा में वह सुबह से शाम तक अपने काम में तल्लौन रहते। देश मे धन ओर श्रम का संग्रास छिड़ा हुआ था | इश्वरचंद्र की सदय प्रकृति ने उन्हे श्रम का सपत्ती बना दिया था। घन-वादियों का
श्र प्रेम-पंचमी खंडन ओर प्रतिवाद करते हुए उनके खूब में गरमी आ जाती थी, शब्दों से चिनगारियाँ निकलने लगती थीं। यद्यपि ये चिन- गारियाँ केंद्रस्थ गर्मी अंत का किए देती थीं ।
एक दिन रात के दस बज गए थे | सरदी खूब पड रही थी । मानकी दबे-पैर उनके कमरे से आई । दीपक की ज्योति में उत्के मुख का पीलापन ओर भी स्पष्ट हो गया था । वह हाथ मे कलम लिए किसो विचार में मग्न थे। सानकी के आने की उन्हें ज़रा भी आहट न मिली । सानकी एक ज्ञण तक उन्हें वेदनायुक्त नेत्रों से ताकती रही । तब बोलो--'“अब तो यह पोथा बंद करो । आधी रात होने को आई । खाना पानी हुआ जाता है ।”
इश्वरचंद्र ने चोककर सिर उठाया, ओर बोले-- 'क्यो क्या आधी रात हो गई ? नहीं, अभो मुश्किल से दस बजे होंगे । मुझे अभी जरा भी भूख नही है ।”
मानकों--छुछ थांड़ा-सा खा लेसा ।
देश्वर०--एक आस भी नही । सुझे इसी समय अपना लेख समाप्त करना है ।
सानकी--में देखती हूं तुम्हारों दशा दिन-दिन विगड़ती जाती है, दवा क्यों नहीं करते ? जान खपाकर थोड़े ही काम किया जाता है ।
ईश्वर०--अपनी जान को देखू या इस घोर सम्राम को देखें, जिसने समस्त देश मे हलचल मचा रक््खी है। हज़ारों-लाखों जानों की द्विमायत में एक जान न भी रहे) तो क्या चिता !
मुस्यु के पीछे १३
मानकी--कोई सुयोग्य सहायक क्यों नही रख लेते १
इश्वस्वद्र ने ठंढी साँस लेकर कहा--“बहुत खोजता हूँ, पर कोई नहीं सिलता। एक विचार कई दिनो से मेरे सन में उठ रहा है, अगर तुम बैय से सुनना चाहो, तो कहूँ ।”
मानको--कहो, मानने लायक होगा, तो सानेँगी क्यों नही !
इंश्वस्वंद्र--में चाहता हैँ कि कृष्णचंद्र को अपने काम में
$& शरीक कर ले | अब तो वह एम्० ए० भी हो गया | इस पेशे
से उसे रुचि भी है। मालूम होता है, इश्वर ने उसे इसी काम के लिये बनाया है ।
सानकी ने अवहेलना-भाव से कहा--“क्या अपने साथ उसे भी ले डूबने का इरादा है ? कोई घर की सेवा करनेवाला भी चाहिए कि सब देश को ही सेवा करेगे ।”
इंश्वर०--कऋष्णचंद्र यहाँ बुरा न रहेगा ।
सानकी--क्षमा कीजिए । बाज आईं | वह कोई दूसरा काम करेगा, जहाँ चार पैसे मिलते । यह घर-फूँक काम आप ही को मुबारक रहे ।
इंश्वर०--वकालत मे भेजोगी, पर ठेख लेना, पछताना पढ़ेगा । ऋष्णचंद्र उस पेशे के लिये सर्वथा अयोग्य है।
सानकी--वह चाहे मजूरो करे, पर इस काम मे न डालूँगी ।
इश्वर०--तुमने मुझे देखकर समझ लिया कि इस काम मे घाटा-ही-घादा है। पर इसी देश में ऐसे भाग्यवान् लोग
१४ प्रेम-पंचमी
मौजूद है; जो पत्नो की बदीलत धन और कीति से मालामाल हो रहे हैं ।
भानकी--इस काम से तो अगर क॑चन भी बरसे, तो में कृष्ण को न आने दूँ । सारा जीवन वेराग्य मे कट गया। अब कुछ दिन भोग भी करना चाहती हूँ ।
यह जाति का सच्चा सेवक अंत को जातीय कष्टों के साथ रोग के कष्ठों को न सह सका । इस वार्तालाप के बाद मुश्किल से ६ महीने गुजरे थे कि ईश्वरचंद्र ने संसार से प्रस्थान किया । उनका सारा जीवन सत्य के पोषण, न्याय की रक्षा और अन्याय के विरोध से कटा था। अपने सिद्धांतों के पालन में उन्हें कितनी ही बार अधिकारियों की तीत्र दृष्टि का भाजन बनता पड़ा था, क्रितनी ही बार जनता का अ्रविश्वास, यहाँ तक कि मित्रों की अवहेलना भी सहनी पड़ी थी, पर उन्होने अपनी आत्मा का कसी खून नही किया। आत्मा के गोरव के सामने धन को कुछ न समझा ।
इस शोक-समाचार के फैलते ही सारे शहर मे कुहराम मच गया । बाजार बंद हो गए: शोक के जलसे होने लगे, पत्रों ने प्रतिदंंद्विता का भाव त्याग दिया, चारो ओर से एक ध्वनि आती थी कि देश से एक स्वतंत्र, सत्यवादी और विचार- शील संपादक तथा एक निर्भीक, त्यागी देशभक्त उठ गया, ओर उसका स्थान चिरकाल तक खाली रहेगा । इश्वरचंद्र इतने बहुजन-प्रिय है, इसका उनके घरवालों को ध्यान भी न था।
सत्यु के पोछे १५
उनका शव निकला, तो सारा शहर अर्थी के साथ था । उनके स्मारक बनने लगें। कहीं छात्रवृत्तियाँ दी गई, कहीं उनके चित्र बनवाए गए, पर सबसे अधिक महत्त्वशाली बह मूर्ति थी, जो श्रमजीवियों की ओर से उनकी स्मृति में प्रतिष्ठित हुई थी ।
मानकी को अपने पतिदेव का लोकसम्मान देखकर सुखमय कुतूहल हाता था । उसे अब खेद होता था कि मैंने उनके द्व्य गणों को न पहचाना, उनके पवित्र भावों और उच्च विचारों की कदर न की । सारा नगर उनके लिये शोक मना रहा है । उनकी लेखनी ने अवश्य इनके ऐसे उपकार किए हैं, जिन्हे ये भूल नहीं सकते; और, मे अंत तक उनके मार्ग का कंठक बनी रही; सदेव तृष्णा के वश उनका दिल दुखातो रही । उन्होंने मुझे साने मे सद दिया होता, एक सव्य भवन बनवाया होता; या कोई जायदाद पैदा कर ली होती, तो मे खुश होती, अपना धन्य भाग्य सममती । लेकिन तब देश मे कौन उनके लिये आँसू बहाता। कौन उनका यश गाता । यहीं एक-्से-एक धनिक पुरुष पड़े हुए हैं।वे दुनिया से चले जाते है; और किसी को खबर भी नहीं होती। सुनती हूँ, पतिदेव के नाम से छात्रों को वृत्तियाँ दी जायँगी। जो लड़के वृत्ति पाकर विद्या- लाभ करेगे, वे मरते दस तक उनकी आत्मा को आशी- वांद देंगे । शोक ! मैंने उनके आत्मत्यांग का समे न जाना। स्वाथ ने मेरी आँखों पर पर्दा डाल दिया था ।
१६ प्रेम-पंचसी
सानकी के हृदय में ज्यो-ज्यों ये भावनाएँ जाग्रत होती जाती थीं; उसकी पति के प्रति श्रद्धा बढ़ती जाती थी। बह गोरवशीला खस्री थो। इस कोतिंगान ओर जनसम्मान से उसका मस्तक ऊँचा हो जाता था । इसके उपरांत अब उसकी आश/थक दशा पहले की-सी चिताजनक न थी । कछष्ण॒चंद्र के असाधारण अध्यवसाय ओर बुद्धि-बल ने उनकी वकालत को चमका दी थी। वह जांतीय कार्मों मे अवश्य भाग लेते थे; पत्रों मे यथाशक्ति लेख भी लिखते थे। इस काम से उन्हे विशेष प्रेम था। लेकिन मानको उन्हे हमेशा इन कासो से दूर रखने की चेष्टा करती रहतो थी । कृष्णचंद्र अपने ऊपर जूत्र करते थे । सा का दिल दुखाना उन्हे सज्र न था ।
इंश्वरचंद्र की पहली बरसो थी। शाम को ब्रह्म भोज हुआ। आधी रात तक ग़रीबों को खाना दिया गया। प्रातःकाल मानकों अ्रपन्ती सेजगाड़ी पर बैठकर गंगा नहाने गई । यह उसकी चिर- संचित अभित्राषा थी, जो अब पुत्र की साठ्भक्ति ने पूरी कर दो थी | यह उधर से लोट रही थी कि उसके कानो से बेंड की आवाज आई, और एक क्षण के बाद एक जलूस सामने आता हुआ दिखाई दिया | पहले कोतल घोड़ों की मसाला थी। उसके बाद अश्वारोही स्वयंसेवको की सेना। उसके पीछे सैकड़ों सवारी-गाड़ियाँ थी । सबके पोछे एक सजे हुए रथ पर किसी देवता की सूर्ति थी । कितने ही आदसो इस विमान को खीच रहे थे। मानकी सोचने लगी-- यह किस देवता का विसान
मृत्यु के पीछे १७ है? न तो रामलीला के ही दिन है, न रथयात्रा के। सहसा उसका दिल जोर से उछल पड़ा । यह इंश्वरचंद्र की मूर्ति थी, जो श्रमजीवियों की ओर से बनवाई गई थो; और लोग उसे बड़े मैदान में स्थापित करने को लिए जाते थे। वही स्वरूप था, वही वस्र, वही मुखाक्रति/ सूर्तिकार ने विल््षण कौशल दिखाया था ! मानकी का हृदय बाँसों उछलने लगा। उत्कंठा हुई कि परदे से निकलकर इस जलूस के सम्मुख पति के चरणो पर गिर पड़ । पत्थर की मूर्ति मानव-शरीर से अधिक श्रद्धास्पद होती है। कितु कौन मुँह लेकर मूर्ति के सामने जाऊँ? उसकी आत्तमा ने कभी उसका इतना तिरस्कार न किया था । सेरी घन-लिप्सा उनके पैरो की वेड़ी न बनती, तो वह न-जाने किस सम्मान- पद पर पहुँचते ! मेरे कारण उन्हे कितना क्ञोभम हुआ !! घर- वार्लो की सहानुभूति वाहरवालों के सम्मान से कही उत्लाह- जनक होती है। में इन्हें क्या कुछ न बना सकती थी, पर कभी उभरने न दिया । स्वासीजी, मुझे क्षमा करो, में तुम्हारी अप- रधिनो हूँ; मेंने तुम्हारे पविन्न भावो की हत्या की है, मेंने तुम्हारी आत्मा को दुखी किया है। मेने वाज को ।पिजड़े मे बंद करके रक्खा था। शोक !
सारे दिन सानकी को यही पश्चात्ताप होतां रहा | शाम को उससे न रद्दा गया। वह अपती कह्दारिन को लेकर पेदल उस देवता के दर्शन को चली, जिसकी आत्मा को उसने दुःख पहुँचाया था ।
श्र प्रेम-पंचमी
संध्या का समय था | आकाश पर लालिमा छाई हुई थी। अस्ताचल की ओर कुछ बादल भी हो आए थे | सूर्यदेव कभी सेघ-पट में छिप जाते थे; कसी वाहर निकल आते थे। इस धूप- छाँह मे इंश्व॒रचंद्र की मूर्ति दूर से कमी प्रभात की भाँति प्रसन्न- मुख ओर कसी संध्या की भाँति सल्िन देख पड़ती थी। सानकी उसके निकट गछ पर उसके सुख की ओर न देख खकी । उत्त आँखों मे करुण वेदवा थी। सानकी को ऐसा मालूम हुआ, मानो वह मेरी ओर तिरस्कार-पूर्ण भाव से देख रही है । उसकी आँखों से ग्लान ओर लज्जा के आँसू बहने लगे। वह मूर्ति के चरणों पर गिर पड़ी, और मुँह ढाँपकर रोने लगी। सन के भाव द्रवित हो गए |
वह घर आई ता नो बज गए थ। ऋष्णचंद्र उसे देखकर बोले--अम्भा। आज आप इस वक्त कहाँ गई थी ९ , मसानकी ने हषे से कहा-गई थी तुम्हारे बाबूजी क॑ प्रतिमा के दर्शन करने | ऐसा मालूम होता है, वह साक्षात खड़े हैं।..., ' कष्ण०--जयपुर से बनकर आई है।
मानको--पहले तो लोग उनका इतना आदर न करते थे।
कृष्ण०--उनका सारा जीवन सत्य और न्याय +ी बका- लत मे गुजरा है। ऐसे हो महात्माओं की पूजा होती है।
मानकी--लेकिन उन्होंने वकालत कब की १
कृष्ण०--हाँ, यह वकालत नहीं की; जो में और मेरे हजारों
मृच्यु के पीछे १६
भाई कर रहे हैं; जिससे न्याय और धर्म का खून हो रहा है। उनको वकालत उच्च कोटि की थी ।
सानकी--अगर ऐसा है, तो तुम भी वही वकालत क्यों नही करते ९
क्ृष्ण०--बहुत कठिन है | दुनिया का ज॑जाल अपने खिर लीजिए, दूसरो के लिये रोइए, दोनों की रक्षा के लिये लट्ट लिए फिरिए अधिकारियों के मुँह आइए, इनका क्रोध और कोप सहिए, और इस कषठ। अपमान ओर यंत्रणा का पुरस्कार क्या है ? अपनो अभिलाषाओं की हत्या ।
मानकी--लेकिन यश तो होता है ।
कृष्ण०--हाँ यश होता है। लोग आशीर्वाद देते हैं ।
मानको--जब इतना यश मिलता है, तो तुम भी वही काम करो । हम लोग उस पवित्र आत्मा की ओर कुछ सेवा नहीं कर सकते, तो उसी वाटिका को सींचते जायें, जो उन्होंने अपने जीवन मे इतने उत्सग और भक्ति से लगाई। इससे उनकी आत्मा को शांति मिलेगी ।
कृष्णचंद्र ने माता को श्रद्धामय नेत्नों से देखकर कहा-- करूँ तो, मगर संभव है, तब यह टोम-टाम न निभ सके । शायद किर वही पहले को-सी दशा हो जाय ।
सानकी--कोई हरज नहीं । संसार मे यश तो होगा । आज तो अगर धन की देवी भी मेरे सामने आदे, तो में आँखें न नीची करूँ।
आशूषण (१)
आभूषणों की निदा करना हमारा उद्देश्य नहीं है । हम असइयोग का उत्पीड़न सह सकते हैं; पर ललनाओं के निर्दय। घातक वाक्य-बाणो को नहीं सह सकते । तो भी इतना अवश्य कहेंगे कि इस तृष्णा की पूति के लिये जितना स्याग किया जाता है, उसका सदुपयोग करने से महान पद प्राप्त हो सकता है ।
यद्यपि हमने किसी रूप-हीना म.हेला को आभूषणों की सजा- बट से रूपवती होते नही देखा, तथापि हम यह भा सान लेते हैं कि रूप के लिये आभूषणों की उतनी ही जरूरत है, जितनी घर के लिये दीपक को । कितु शारीरिक शोभा के लिये हम मन को कितना सलिन; चित्त को कितना अशांत ओर आत्मा को कितना कलुषित बना लेते हैं; इसका हमे कदाचित् ज्ञान ही नही होता । इस दीपक को ज्योति मे आँखें घुँघली हो जाती है । यह चसक- द्सक कितसी इषा, कितने हवेष, कितनी प्रतिस्पद्धो, कितनी दुश्चिता ओर कितनी दुराशा का कारण है; इसकी केवल कल्पना से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन्हे भूषण नहीं, दूषण कहना अधिक उपयुक्त है। नहीं तो यह कब हो सकता था कि कोई नववधू, पति के घर आने के तीसरे ही दिन, अपने पति से कहती कि “मेरे पिता ने तुम्हारे पल््ले बाँधकर मुझे तो कुएँ में ढकेल दिया!!!
आभूषण २१
शीतला आज अपने गाँव के ताल्लुकेदार कूँअर सुरेशसिंह की नवविवाहिता वधू को देखने गई थी । उसके सामने ही चह संत्र-मुग्ध-सो हो गई । बहू के रूप-लावण्य पर नहीं) उसके आभूषणो की जगमगाहट पर उसको टकटकी लगी रही। और वह जब से घर लोौटकर आई उसकी छाती पर साँप लोटता रहा । अंत को ज्यों ही उसका पति घर आया, वह उस पर बरस पड़ी, और दिल में भरा हुआ ग्ुबार पूर्वोक्त शब्दों मे निकल पड़ा | शीतला के पति का नाम विसलसिह था । उसके पुरखे किसी जमाने मे इलाक़ेदार थे। इस गाँव पर भी उन्हीं का सोलहो आने अधिकार था। लेकिन अब इस घर की दशा हीन हो गई है । सुरेशसिह के पिता ज़मीदारी के काम मे दत्त थे | विमलसिह का सव इलाका किसी-न-किसी प्रकार से उनके हाथ आ गया । विमल के पास सवारी का टटट्टू, भी न था। उसे दिन में दो बार भाजन भो मुशकिल से मिलता था। उधर सुरेश के पास हाथी, मोटर ओर कई घोड़े थे ; दस-पाँच बाहर के आदमी नित्य द्वार पर पड़े रहते थे । पर इतनी विष- मता होने पर भो दोनो मे भाई-चारा निभाया जाता था, शादी- व्याह मे, मूंडन-छेदन में परस्पर आना-जाना होता रहता था। सुरेश विद्यात्रेसी थे, हिदुस्थान मे ऊँची शिक्षा समांप्त करके वह योरप चले गए, ओर सब लोगों की शंकाओ के विपरीत चहाँ से आय-सभ्यता के परम भक्त बनकर ल्ौंटे थे। वहाँ के जड़वाद, कृत्रिम भोगलिप्सा और अमानुपिक मदांघता ४
श्र प्रेम-पंचमी
उनकी आँख खोल दी थीं । पहले वह घरवालों के बहुत जोर देने पर भी विवाह करने को राजी नहीं हुए । लड़की से पूर्व परिचय हुए विना प्रणय नहीं कर सकते थे। पर योरप से लौटने पर उनके वैवाहिक विचारों मे बहुत बढ़ा परिवतन हो गया। उन्होंने उसी पहले की कन्या से, विना उसके आचार- विचार जाने हुए; विवाह कर लिया । अब वह विवाह को प्रेस का बंधन नहीं, धर्म का वंधत सममते थे। उसी सोभाग्यवती वधू को देखने के लिये आज शीतला, अपनी सास के साथ; सुरेश के घर गई थी। उसी के आशभूषणों की छटा देखकर बह सर्माहत-सी हो गई है। विसल ने व्यथित होकर कहा-- तो माता-पिता से कहा होता, सुरेश से व्याह कर देते । वह तुम्हे गहनों से ल्ञाद सकते थे ।
शीतला--तो गाली क्यों देते हो ९
विसल्-गाल्ली नही देता, बात कहता हूँ। तुम-जेसी सुंदरी को उन्होंने नाहक, सेरे साथ व्याहा ।
शीतला--लजाते तो हो नही, उल्लटे ओर ताने देते हो !
विमत्न--भाग्य सेरे वश में नहीं हे। इतना पढ़ा भी नही हूँ कि कोई बढ़ी नोकरी करके रूपए कमाऊँ।
शीतल्ला--यह क्यों नही कहते कि प्रेम ही नहीं है। प्रेम हो, तो कंचन बरसने लगे |
विसल--तुम्हें गहनों से बहुत प्रेम है ?
शीतला--सभी को होता है। मुझे भी है ।
हूँ ८
आभूषण २३
विमल--अपने को अभागिनी सममती हो ? शीतला--हूँ ही सममना कैसा ? नहीं तो क्या दूसरे को देखकर तरसना पड़ता ९ विसल--गहने बनवा दूँ, तो अपने को भाग्यवती सममने लगोगी ? शीतला--( चिढ़फर ) तुम तो इस तरह पूछ रहे हो, जेसे सुनार दरवाज़े पर बैठा है । विमल--नही, सच कहता हूँ, बनवा दूँ गा। हाँ, छुछ दिन |सबर करना पड़ेगा। (२) समथ पुरुषों को बात लग जाती है, तो वे प्राण ले लेते हैं । सासथ्य-हीन पुरुष अपनी ही जान पर खेल जाता है। विमल- सिह ने घर से निकल जाने की ठानी | निश्चय किया, था तो इसे गहनो से ही लाद दूँगा या वैधव्य-शोक से; या तो आभू- षण ही पहनेगी या सेंदुर को भी तरसेगी । द्नि-भर बह चिता से डूबा पड़ा रहा। शीतला को उसने ग्रेम से संतुए्त करना चाहा था । आज अनुभव हुआ कि नारी का हृदय प्रेम-पाश से नहीं बँधता, कंचन के पाश हो से बेँध सकता है। पहर रात जाते-जाते वह घर से चल खड़ा हुआ । पीछे फिरकर भी न देखा । ज्ञान से जागे हुए घिराग मे चाद्दे भोह का संस्कार हो, पर नेराश्य से जागा हुआ विराग अचल होता है। प्रकाश मे इधर-उधर की वस्तुओं को देखकर मन
२छ प्रेम-पंचमी
विचलित हो सकता है । पर अंधकार में किसका साहस है, जो लीक से जी-भर भी हट सके ।
विमल के पास विद्या न थी। कल्ला-कोशल भी ने था; उसे केवल अपने कठिन परिश्रम और कठिन आत्मत्याग ही का आधार था| वह पहले कल्नकत्ते गया । वहाँ कुछ दिन तक एक सेठ को दरबानी करता रहा। वहाँ जो सुन पाया कि रंगून में सज़दूरी अच्छी मिलती है, तो रंगून जा पहुँचा; और बंदर पर साल चढ़ाने-उत्तारने का काम करने लगा |
कुछ तो कठिन श्रम, कुछ खाने-पीने के असंयम और कुछ जल-बायु की खराबी के कारण वह बीमार हो गया । शरीर ढुबंल हो गय। मुख की कांति जाती रही ; फिर भी उससे ज्यादा मेह- नती मजदूर बंदर पर दूसरा न था। और मजदूर मजदूर थे, पर यह मज़दर तपरवी था। मन मे जो कुछ ठान लिया था, उसे पूरा करना ही उसके जीवन का एक-सात्र उद्देश्य था।
उसने घर का अपना कोई समाचार न भेजा । अपने मन से तक किया, घर मे कोन मेय हितू है ? गहनो के सामने मुझे कौन पूछता है ? उसकी बुद्धि यह रहस्य सममने मे असम थी कि आभषणों की लालसा रहने पर भी प्रणय का पालन किया जा सकता है! और मजदूर प्रातःकाल सेरो मिठाई खाकर
जल-पान करते; दिन-भर--दम-दूसन््भर पर--गॉजः चरस आर तमाख के दम लगाते ; अवकाश पाते, तो बाजार की सेर करस्ते । कितनों ही को शराब का भी शौक था। पेसों के
आभूषण २५
बदले रुपए कमाते, तो पैसों की जगह रुपए खर्चा भो कर डालते थे। किसी की देह पर साबित कपड़े तक न थे। पर विमल उन गिनती के दो-चार मज़दूरों मे से था, जो संयम से रहते थे, जिनके जीवन का उद्देश्य खा-्पीकर मर जाने के सिवा कुछ और भो था। थोड़े हो दिनों मे उसके पास थोड़ी-सी संपत्ति हो गई । धन के साथ ओर मजदूरों पर दबाव भो बढ़ने लगा । यह् प्रायः सभी जानते थे कि विमल जाति का कुलीन ठाकुर है । सब ठाकुर ही कहकर उसे पुकारते | संयस और आचार सम्मान-सिद्धि के मंत्र हैं । विमल मजदूरों का नेता ओर महाजन हो गया |
विमल को रंगून मे काम करते तीन वष हो चुके थे । संध्या हो गई थी । वह कई मजदूरों के साथ समुद्र के किनारे बैठ बाते कर रहा था ।
एक मजूदूर ने कहा--यहाँ की सभी ख्त्रियाँ निठुर होती हैं । बेचारा भींगुर १० बरस से उस बर्मी ख्री के साथ रहता था। कोई अपनी व्याही जोरू से भी इतना प्रेम न करता होगा । उस पर इतना विश्वास करता था कि जो कुछ कमाता, उसके हाथ में रख देता । तोन लड़के थे । अभी कल तक दोनो साथ- साथ खाकर लेटे थे। न कोई लड़ाई, न झगड़ा; न बात न चीत; रात को ओरत न-जाने कब उठी, ओर न-जाने कहाँ चली गई | लड़कों को छोड़ गई । बेचारा भोंगुर बैठा रो रहा है। सबसे बड़ी मुशकिल तो छोटे बच्चे की है। अभी कुल छः महीने का है। केसे जिएगा, भगवान् ही जाने ।
२८६ प्रेम-पंचमी
विसलसिह ने गंभीर भाव से कहा--गहने बनवाना था कि नहीं ९
सजुदूर--रुपए-पैेसे तो औरत हो के हाथ में थे। गहने बनवाती, तो उसका हाथ कौन पकड़ता ?
दूसरे सजुदूर ने कह्दा--गहनों से तो लदी हुई थी । जिधर से निकल जाती थो, छुम-छम की आवाजु से कान भर जति थे।
विमल्--जब गहने बनवाने पर भी निठुराई की, तो यही कहना पडेगा कि यह जाति ही बेवफा होती है ।
इतने मे एक आदसी आकर विसलसिह से बोला--चोधरी, असी समुके एक सिपाही सिला था। वह तुम्हारा नास, गाँव ओर बाप का नास पूछ रहा था। कोई बाबू सुरेशसिह हैं ?
विमल ने सशंक होकर कहा-हाँ, हैं । भेरे गाँव के इलाक़े- दार ओर बिरादरी के भाई हैं ।
आदमी--उन्होंने थाने में कोई! नोटिस छपवाया है कि जो विमलसिह का पता लगावेगा; उसे १,०००) का इनास मिलेगा ।
विमल--तो तुमने सिपाही को सब ठीक-ठीक बता दिया ९
आदमी--चोधरी, में कोई गंवार हूँ क्या? समझ गया; कुछ दाल मे काला है ; नही तो कोई इतने रुपए क्यो खर्च करता । मेने कह दिया कि उनका नाम विमलसिह नही; जसोदा पाँड़े है। बाप का नाम सुक्खू बताया, और घर जिला माँसी में | पूछने लगा, यहाँ कितने दिन से रहता है ? मैंने कह्दा, कोई
आभूषण २७
द्स साल से । तब कुछ सोचकर चला गया। सुरेश बाबू से तुमसे कोई अदावत है क्या; चोधरी ९
विमल--अदावत तो नहीं थी, मगर कौन जाने, उनकी नीयत बिगड़ गई हो । मुझ पर कोई अपराध लगाकर मेरी जगह-जुमीन पर हाथ बढ़ाना चाहते हों । तुमने बढ़ा अच्छा किया कि सिपाही को उड़नघाई बताई ।
आदमी--मुमसे कहता था कि ठीक-ठीक बता दो, तो ४०) तुम्हें भी दिला दूँ । मेने सोचा--आप तो ११०००) की गठरी मारेगा, और मुझे; ४०) दिलाने को कहता है। फटकार बता दी ।
एक सजुदूर--मगर जो २००) देने को कहता, तो तुस सब ठीक-ठीक नाम-ठिकाना बता देते ? क्यों ? धत् तेरे ज्लालची की !
आदसी--( लब्जित होकर ) २००) नहीं, २,०००) भी देता, तो न बताता । सुझे ऐसा विश्वासघात करनेवाला मत समभो । जब जी चाहे, परख लो ।
मजदूरों मे यों! वाद-विवाद होता ही रहा; विमल आकर अपनी कोठरी मे लेट गया । वह सोचने ल्गा--अब क्या करूँ ? जब सुरेश-जैसे सज्जन की नीयत बदल गई, तो अब किसका भरोसा करूँ ! नहीं, अब बिना घर गए काम नहीं चलेगा | छुछ दिन ओर न गया, तो फिर कही का न होऊँगा। दो साल और रह जाता, तो पास मे पूरे ४४०००) हो जाते।” शीतला की इच्छा कुछ पूरी हो जाती । अभी तो सब मिलाकर ३१००९) ही होंगे, इतने मे उसकी अभिलाषा न पूरी होगी।
र्प प्रेम -पंचसी
खेर, अभी चहूँ। छ- महीने मे फिर लौट आईँगा। अपनी जायदाद तो बच जायगी | नहीं, छः महीने रहने का क्या काम है ? जाने-आने मे एक महीना लग जायगा । घर में १५ दिन से ज्यादा न रहूँगा । वहाँ कोन पूछता है, आऊँ या रहूँ; मरूँ या जिऊँ; वहाँ तो गहनों से प्रेम है | इस तरह सन से निश्चय करके वह दूसरे दिन रंगून से चल पड़ा । (३) संसार कहता है, गुण के सामने रूप की कोई हस्ती नही।
हमारे नीति-शाझ्म के आचार्यो का भो यही कथन है । पर वास्तव मे यह कितना भ्रम-मूलक हे ! कुँअर सुरेशसिद् को नववधू मंगलाकुमारी ग्ृह-काय मे निपुण, पति के इशारे पर प्राण देने- वाली,अत्यंत विचारशीला, मधुर-भाषिणी ओर धमे-भीरु थी; पर सोदय-विद्दीन होने के कारण पति को आँखो से काँटे के समान खटकती थी । सुरेशसिह बात-बात पर उस पर मु झलाते, पर घड़ी-भर में पश्चात्ताप के वशीभूत होकर उससे क्षमा साँगते;
कितु दूसरे ही दिन फिर वही कुत्सित व्यापार शुरू हो जाता ।
विपत्ति यह थी कि उत्तके आचरण अन्य रइंसों की भाँति श्रष्ट
न थे। वह दांपत्य जीवन हो मे आनंद, सुख; शांति) विश्वास, आयः सभी ऐहिक और पारमार्थिक उद्दे श्य पूरा करनां चाहते
थे, और दांपत्य सुख से वंचित होकर उन्हे अपना समस्त
जीवन नीरस, स्वाद-हीन और कुंठित जान पड़ता था। फल्न
आभूषण २६
यह हुआ कि मंगला को अपने ऊपर विश्वास न रहा। वह अपने मन से कोई कास करते हुए डरती कि स्वामी नाराजु होंगे। स्वामी को खुश रखने के लिये अपनी भूलों को छिपाती, बहाने करती, भूठ बोलती । नोकरों को अपराध लगाकर आत्मरक्षा करना चाहती | पति को प्रसन्न रखने के लिये उसने अपने गुणों की, अपनी आत्मा की अवहेला की ; पर उठने के बदले वह पति की नज़रों से गिरती ही गई । वह नित्य नए झआंगार करती, पर लक्ष्य से दूर होती जाती । पति की एक मधुर सुसकान के लिये, उनके अघरों के एक मीठे शब्द के लिये, उसका प्यासा हृदय तड़प-तड़पकर रह जाता | लावण्य- विहीन ख्रो वह भिक्तुक नही है, जो चंगुल-भर आटे से संतुष्ट हो जाय । वह भी पति का संपूर्ण, अखंड प्रेम चाहती है; ओर कदाचित् सुंदरियो से अधिक ; क्योंकि वह इसके लिये असा- धारण प्रयत्न आर अनुष्ठान करती है। मंगला इस प्रयत्न मे निष्फल होकर आंर भो संतप्त हाती थी ।
धीर घीरे पति पर से उसकी श्रद्धा उठने त्ञगी | उसने तके किया कि ऐसे ऋर हृदय-शून्य, कल्पन।हीन मनुष्य से में भी उसी का-सा व्यवहार करूँगी | जो पुरुष केवल रूप का भक्त: है, वह प्रेम-भक्ति के योग्य नहों। इस अत्याधात ने समस्या ओर भी जटिल कर दी ।
सगर सगला को केवज्न अपनी रूप-हीनता ही का रोना न था, शीतत्ला का अनुपम रूप-लालित्य भी उसकी कामनाओ का
३० प्रेम-पंचमी
बाघक था; बल्कि यही उसकी आशा-लताआं पर पड़नेवाला तुषार था। संगला सुंदरी न सही, पर पति पर जान देता थां। जा अपने को चाहे; उससे हम विम्मुख नहीं हो सकते ; प्रेम की शक्ति अपार है। पर शोतला की मूर्ति सुरेश के हृदय-द्वार पर बैठी हुई मंगला को अंदर न जाने देती थी, चाहे वह कितना ही वेष बदलकर आवे | सुरेश इस म॒र्ति को हटाने की चेष्टा करते थे, उसे बलात् निकाल देना चाहते।थे ; कितु सोंदय का आधिपत्य धन के आधिपत्य से कम्त दुर्निवार नहाँ होता । जिस दिन शीतल्ला इस घर में मंगला का मे ह देखने आई थी, उसी दिन सुरेश की आँखो ने उसकी सनोदर छवि की एक सत्नक देख ली थो । वह एक झलक मानो एक क्षणिक क्रिया थी, जिसने एक ही धावे मे समस्त हुद्य-राज्य को जीव लिया-- उस पर अपना आधिपस्य जमा लिया ।
सुरेश एकांत मे बेठे हुए शोततला के चित्र को मंगला से मिलाते, यह निश्चय करने के लिये कि उनमे अंतर क्या है २ एक क्यों मन को खीचती है; दूसरी क्यों उसे हटातो है ? पर उनके सन का यह खिचाव केवल एक चित्रकार या कवि का रसास्वादन-मात्र था। वह पबित्र और वासनाओं से रहित था । बह मूर्ति केवल उनके मनोरंजन की सामग्री-मात्र थी। वह अपने सन को बहुत सममाते, संकल्प करते कि अब मंगला को प्रसन्न रक्खूँ गा। यदि वह सुंद्री नहीं है, वो उसका क्या दोष ? पर उनका यह सब प्रयास संगला के सम्मुख जाते ही
आभूषण ३१
विफल हो जाता था। वह बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से मंगला के मन के बदलते हुए भावों को देखते ; पर एक पक्षाघात-पीड़ित मनुष्य की भाँति घी के घड़े को लुढ़कते देखकर भी रोकने का कोई उपाय न कर सकते। परिणाम क्या होगा, यह सोचने का उन्हे साहल ही न होता | पर जब मंगला ने अंत को वात-बात मे उनकी तीत्र आलोचना करना शुरू कर दिया, वह उनसे उच्छे खलता का व्यवहार करने लगी, तब उसके प्रति उनका वह उतना सोहाद भी विलुप्त हो गया। घर से आना-जाना ही छोड़ दिया । एक दिन संध्या के समय बड़ी गर्मी थी। पंखा भलने से _..
आंग ओर भी दहकती थी। कोई सैर करने बगीचों में भी न जा सकता था । पसीने की भाँति शरीर से सारी रफूर्ति बह गई थी। जो जहाँ था, बहीं मुर्दा-सा पढ़ा था। आग से सेंके हुए सुदंग की भाँति लोगों के स्वर ककश हो गए थे । साधारग बातचीत में भो लोग उत्तेजित हो जाते, जैसे साधारण संघष से वच के वृक्ष जल उठते हैं । सुरेशसिह कभी चार कदम टहलते, फिर हाँफकर बैठ जाते । नौकरो पर मुँकला रहे थे कि जल्द-जल्द छिड़काव क्यों नहीं करते ? सहसा उन्हे अंदर से गाने की आवाज़ सुनाई दी । चोके, फिर क्रोध आया । मधुर गान कानों को अग्रिय जान पड़ा । यह क्या बेवक्त की शहनाई है ! यहाँ गरसी के सारे दस निकल रहा है; और इन सबको गाने को सूभी है ! मंगला ने बुलाया होगा/ और क्या ! लोग नाहक्
श्र प्रेम-पंचसी
कहते है कि स्लियों के जीवन का आधार प्रेम है। उनके जीवन का आधार वही भोजन; निद्रा, राग-रंग, आसोद-प्रमोद् है, जो समस्त प्राणियों का है । घंटे-मर तो सुन चुका। यह गीत कभो बंद भी होगा या नही; सब व्यथ मे गला फाड़-फाड- कर चिल्ला रही हैं। अंत को न रहा गया। जनानखाने में आकर वोले---/यह तुम लोगों ने क्या काँव-काँव मचा रक््खी है ? यह गाने-बजाने का कौन-सा समय है ? बाहर बैठना मुशकिल हो गया !” सन्नाटा छा गया, जैसे शोर-ग्रल मचानेवाले बालकों में सास्टर पहुँच जाय ! ससी ने सिर रुका लिए, ओर सिसट गईं। मंगला तुरंत उठकर सामनेवाले कमरे मे चली गई। पति को बुलाया, ओर नआहिस्ते से वोली--क्यों इतना बिगड़ रहे हो ! ५मैं इस व,क्त गाना नही सुनना चाहता ।” ५तुम्दे सुनाता हो कौन है? क्या मेरे कानों पर भी तुम्हारा अधिकार है ९” “क़ुजूल की बमचख--” “तुमसे मतलब ?” “मे अपने घर में यह कोलाहल न मचने दूँगा !” “तो मेरा घर कह्दी और है ९” सुरेशसिह इसका उत्तर न देकर बोले--इन सबसे कह दो, फिर किसी वक्तु आवें |
आभूषण ेईं
मंगला--इसलिये कि तुम्हे इनका आना अच्छा नहीं लगता ९
“हाँ, इसीलिये !”
“तुम क्या सदा वही करते हो, जो मुझे अच्छा लगे ९ तुम्हारे यहाँ मित्र आते हैं, हँसी-ठट्टे की आवाज़ अंदर सुनाई देती है। मे कभी नहीं कहती कि इन लोगों का आना बंद कर दो । तुम मेरे कामो मे दस्तंदाज़ी क्यो करते हो १”
सुरेश ने तेज़ होकर कहा-इसलिये। कि में घर का स्वामी हूँ ।
संगला--तुम बाहर के स्वामी हो; यहाँ मेरा अधिकार है ।
सुरेश--क्यों व्यय की बक-बक करती हो ? सुझे चिढ़ाने से क्या मिलेगा ९
मंगला जरा देर चुपचाप खड़ी रही । वह पति के मनोगत भावों की सीसांसा कर रही थी। फिर बोली--अच्छी बात है। अब इस घर में मेरा कोई अधिकार नही; तो न रहूँगी। अब तक अम मे थी। आज तुमने वह श्रम मिटा दिया। मेरा इस घर पर अधिकार कभी नही था। जिस ख््री का पति के हृदय पर अधिकार नही; उसका उसकी संपत्ति पर भ्री कोई अधिकार नही हो सकता ।
सुरेश ने लज्जित होकर कहा--बात का बत॑गड़ क्यो बनाती हो | मेरा यह मतलब न था । कुछ-का-कुछ समझ गई |
संगला--सन की बात आदसी के सु ह से अनायास ही निकल जाती है । फिर सावधान होकर हम अपने मावो को छिपा लेते हैं ।
32 प्रेम-पैचमी
' सुरेश को अपनी असज्जनता पर दुः्ख तो हुआ, पर इस भय से कि में इसे जितना ही मनाऊँगा, उत्तना ही यह और जली-कटी सुनावेगी; उसे वहीं छोड़कर बाहर चले आए |
प्रातः्काल ठंडो हवा चल रही थी । सुरेश खुमारी में पढ़े हुए स्वप्न देख रहे थे कि संगला सामने से चली जा रही है। चोक पड़े। देखा, द्वार पर सचमुच संगला खड़ी है। घर की नौकरानियाँ आँचल से आँखें पोछ रही हैं । कई नोकर आस- पास खड़े हैं। सभी की आँखें सजल और सुख उदास हैं। मानो बहू विदा हो रही है ।
सुरेश समझ गए कि मंगल्ा को कल को बात ल्ग गई। पर उन्होंने उठकर कुछ पूछने की, मनाने को या समभाने को चेष्टा न को । यह मेरा अपमान कर रही है, सिर नोचा कर रही है। जहाँ चाहे, जाय । सुझते कोई मतलब नही। यों विना कुछ पूछे-पाछ चले जाने का अथ यह है कि में इसका कोई नही। किर मै इसे रोकनेवाला कोन !
बह यो ही जड़वत् पड़े रहे, और मंगला चलो गईं । उनको तरफ सुँह उठाकर भो न ताका ।
(४)
समंगला पाँव-पेद्ल चलो जा रही थो। एक बड़े ताल्लुक़ेदार की ओरत के लिये यह मामूलो बात न थी। हर किसी को हिम्मत न पड़ती कि उससे कुछ कहे | पुरुष उसकी राह छोड़- कर किनारे खड़े हा जाते थे | नारियाँ ढ्वार पर खड़ो करुण
आभूषण ३४
ऋतूहल से देखती थीं, और आँखों से कहती थीं--हा नि्दयी पुरुष ! इतना भी न हो सका कि डोले पर तो बैठा देता ।
इस गाँव से निकलकर मंगला उस गाँव मे पहुँची, जहाँ शीतला रहती थी | शीतला सुनते ही द्वार पर आकर खड़ी हो गई; ओर मंगला से बोली--बहन, ज़रा आकर दस ले लो ।
मंगला ने अंदर जाकर देखा, तो मकान जगह-जगह से गिरा हुआ था । दालान में एक वृद्धा खाट पर पड़ी थी। चारो ओर ब्रिद्रता के चिह्न दिखाई देते थ ।
शातत्षा ने पूछा--यह् क्या हुआ ?
संगला--जो भाग्य मे लिखा था ।
शीतला--कुँअरजी ने कुछ कहा-सुत्ता क्या !
संगला--मसु ह से कुछ न कहने पर भी ता मन को बात छिपी नहीं रहती ।
शांतन्ञा--अरे तो क्या अब यहाँ तक भौबत आ गई !
दु-ख की अतिम दशा संकोच-होन होती है । मंगला ने कह्दा-- चाहती, तो अब भो पड़ी रहती । उसी घर मे जीवन कट जाता | पर जहाँ प्रेम नही, पूछ नही, मान नही, वहाँ अब नही रह सकती |
शीवला--तुम्हारा मायका कहां है ९
मंगल्ा--मायके कान मुह लेकर जाऊँगी
शीतला--तब कहाँ जाओगी ९
मंगला--इईश्वर के दरबार मे । पूछेँगी। तुमने मुझे सुंदरता
हम प्रेम-पंचसी
क्यों नही दी १ बदसूरत क्यों बनाया ? वहन ख्री के लिये इससे अधिक दुर्भाग्य की बात नही कि वह रूप-हीन हो। शायद् पुरबले जनस की पिशाचिनिरयाँ ही बद्सूरत औरतें होती है। रूप से श्रेम मिलता है; और, श्रेस से दुल्लेभ कोई वस्तु नही ।
यह कहकर संगला उठ खड़ी हुई । शीतला ने उसे रोका नही । सोचा--इसे खिलाऊँगी क्या, आज तो चूल्हा जलने की
कोई आशा नही ।
उसके जाने के बाद बह बहुत देर तक बैठी सोचती रही-- में कैसी अभागिन हूँ ।जिस ग्रेस को न पाकर यह बेचारी जीवन को त्याग रही है; उसी प्रेम को मैने पॉव से ठुकरा दिया ! इसे ज्वर की क्या कमी थी? क्या ये सारे जड़ाऊ जेवर इसे सुखो रख सके ? इसने उन्हे पॉव से ठुकरा दिया । उन्ही आभूपणा के लिये मेने अपना सवबेस्व खो दिया । हा ! ने-जाने वह ( विमलसिंह ) कहाँ है। किस दशा मे है !
अपनी लालसा को, दृष्णा को, वह कितनी ही बार घिकार चुंकी थी । शीतला की दशा देखकर आज उसे आभूषणो से घृणा हो गई। |
विमल को घर छोड़े दो साल हो गए थे | शीतला को अब लनके बारे में माँति-भाँति की शंकाएं' होने लगी | आठो पहर उसके चित्त में ग्लानि ओर ज्ञोभ की आग खुलगती ।
मंदिहात के छोट-मोटे ज़मीदारों का काम डाँट-हपट: छीन-
आशभूषण ३७
ऋपट ही से चला करता है। विमल की खेती बेगार में होती थी । उसके जाने के बाद सारे खेत परती रह गए। कोई जोतनेवाला न मिला | इस खयाल से सामझे पर भी किसी ने न जोता कि बीच में कहीं विमलसिह आ गए; तो सामेदार को अगूठा दिखा देंगे। असामियों ने लगान न दिया । शीतला ने महाजन से रुपए उधार लेकर काम चलाया । दूसरे वर्ष भी यही केफियत रही । अब की महाजन ने भी रुपए न दिए । शीतला के गहनों के सिर गई । दूसरा साल समाप्त होते-होते घर की सब लेई- पूँजी निकल गई । फाके होने लगे। बूढ़ी सास, छोटा देवर ननेंद ऑर आप चार प्राणियो का खच था। नात-हित भी आते ही रहते थे । उस पर यह और मुसीबत हुईं कि मायके में एक फोजदारी हो गई । पिता और बड़े भाई उसमें फँस गए । ' दो छोटे भाई, एक बहन ओर माता, चार प्राणी ओर सिर पर आ डटे। गाड़ी पहले ही मुश्किल से चलती थी, अब जमीन में घँस गई । प्रातःकाल से कलह का आर॑स हो जाता। समधिन समधिन से, साले बहनोई से गुथ जाते । कभी तो अन्न के अभाव से भोजन ही न बनता $ कभी; भोजन बनने पर भी, गाली-गलौज के कारण खाने को नौबत न आती । लड़के दूसरों के खेतों में जाकर गज्ने और सटर खाते; वूढ़ियाँ दूसरों के घर जाकर अपना दुखड़ा रोती और ठकुर-सोहातो कहतीं | पुरुष की अनु- पस्थिति में ख्री के मायकेवालो का प्राधान्य हो जाता है। इस
श्ष प्रेम-पंचमी संग्राम में प्रायः विजय-पताका मायकेवालों के ही हाथ रहती है। किसी भाँति घर में नाज आ जाता, तो उसे पीसे कौन ! शीतला की मा कहती, चार दिन के लिये आई हैँ, तो क्या चक्की घलाऊँ ९ सास कहती, खाने की वेर तो विल्ली की तरह लपकेंगी, पीसते क्यों जान निकलती है ? विवश होकर शीतला को अकेले पीसना पड़ता। भोजन के समय वह महाभारत मचता कि पढ़ोसवाले तंग आ जाते |! शीतला कभी मा के पेरों पड़ती, कभी सास के चरण पकड्ती ; लेकिन दोनो ही उसे मिड़क देतीं। भा कहती, तने यहाँ बुलाकर हमारा पानी उतार लिया। सास कहती, भेरी छाती पर सीत लाकर बैठा दी; अब वातें बनाती है ? इस घोर विवाद मे शीतत्ला अपना विरह-शोक भूल गई । सारी अमंगल-शंकाएँ इस विरोधाग्नि मे शांत हो गई। बस, अब यही चिता थी कि इस दशा से छुटकारा केसे हो ? मा ओर सास, दोनों हो का यमराज के सिवा और कही ठिकाना न था; पर यमराज उनका स्वागत करने के लिये बहुत उत्सुक नहीं जान पड़ते थे । सेकडों उपाय सोचती, पर उस पथिक की भाँति जो द्निन्भर चलकर भी अपने द्वार ही पर खड़ा हो, उसकी सोचने की शक्ति निश्चल हो गई थी । चारो तरफ निगाहे दौड़ाती कि कही कोई शरण का स्थान है ? पर कही निगाह न जमती | एक दिन वह इसी नेराश्य की अवस्था मे द्वार पर खड़ी थी । मुसीबत मे, चित्त की उहविग्नता मे; इंतज़ार मे, द्वार से श्रेमन्सा हो जाता है। सहसा उसने बाबू सुरेशसिद् को सामने से घोड़े
आभूषण शे६
पर जाते देखा | उनकी आँखे उसकी ओर फिरी | आँखें मिल गईं। वह मिकककर पीछे हट गई। किवाड़े बंद कर जिए | कुअर साहब आगे बढ़ गए । शीतला को खेद हुआ कि उन्होंने मुझे देख लिया । मेरे सिर पर सारी फटी हुईं थी, चारो तरफ उसमें पेब॑द लगे हुए थे ! वह अपने मन में न-जाने क्या कहते होंगे ९
कुँअर साहब को गाँववालों से विभमलसिह के परिवार के कष्ठों की ग्वबर मिली थी। वह गुप्त रूप से उसकी कुछ सहा- यता करना चाहते थे। पर शीतला फो देखते ही संकोच ने उन्हें ऐसा दवाया कि द्वार पर एक क्षण भी न रुक सके। मंगला के गृह-त्याग के तीन महीने पीछे आज चह पहली बार घर से निकले थे। मारे शर्म के बाहर बैठना छोड़ दिया था।
इससे संदेह नहीं कि कं अर साहब मन मे शीतल के रूप-रस का आस्वादन करते थे। मंगला के जाने के बाद उनके हृदय में एक विचित्र दुष्कामना जग उठी । क्या किसी उपाय से यह सुंदरी मेरी नही हो सकती ९ विमल का मुद्दत से पता नही। बहुत संभव है; वह अब ससार में न हो। किंतु बह इस दुष्कल्पना का बिचार से दबाते रहते थे । शीतला की विपत्ति की कथा सुनकर सी वह उसकी सहायता करते डरते थे। कोन जाने; वासना यही वेष रखकर मेरे विचार और विवेक पर कुठारा- घात न करना चाहती हो । अंत को लालसा की कपट-लीला उन्हें भुलावा दे ही गई। वह शीतला के घर उसका हाल-चात्
४० प्रेम-पंचमी पूछने गए । सन से तक किया--यह् कितना घोर अन्याय है कि एक अबला ऐसे संकट मे हो, ओर में उसकी बात भी न पूछ ९ पर वहाँ से लौटे, तो बुद्धि और विवेक की रस्सियाँ हट गई थीं, नौका मोह और वासना के अपार सागर में हुब- कियाँ खा रही थी । आह ! यह मनोहर छवि! यह अनु- पस सोदय !
एक क्षण में उन्मत्तों की भाँति बकने लगे--यह प्राण और यह शरीर तेरी भेट करता हूँ | संसार हँसेगा। हँसे । महापाप है, हो । कोई चिंता नहीं । इस स्वर्गीय आनंद से में अपने को वंचित नही रख सकता ? वह मुकसे भाग नहीं सकती। इस हृदय को छाती से निकालकर उसके पेरों पर रख दूँगा। विमल ? सर गया । नही मरा, तो अब मरेगा । पाप क्या है ! कोई बात नहीं। कमल कितना कोमल, कितना प्रफुल्ल, कितना ललित है! क्या उसके अधरो--
अकर्मातू् वह ठिठक गए, जैसे कोई भल्री हुई बात यद आ जाय मनुष्य मे बुद्धि के अंतर्गत एक अज्ञात बुद्धि होती है। जेसे रण-क्षेत्र मे हिम्मत हारकर भागनेवाले सैनिको को किसी गुप्त स्थान ले आनेवाली कमक सेँभाल लेती है, वैसे ही इस अज्ञात बुद्धि ने सुरेश को सचेत कर दिया। वह सेमल गए। ग्लानि से उनकी आँखें भर आईं | वह कई मिनट तक किसी दंढित क़ेदी की भाँति छुब्घ खड़े सोचते रहे | फिर विजय-ध्वनि से कह उठे--कितना सरल है । इस विकार के हाथी को
आसूषणु
सिह से नही, चिएंटो से मारूँगा। शीतला'केोएक जरिः बहन! कह देने से ही यह सत्र विकार शांत हो जायगा। शीतला ! वहन ! में तेरा भाई हूँ
उसी क्षण उन्होंने शीतला को पत्र लिखा--वहन, तुमने इतने कष्ट केले ; पर मुझे खब्र तक न दी ! में कोई गैर न था। मुझे इसका दुःख है | खर, अव इश्वर ने चाहा तो तुम्हें कष्ट न होगा।
इस पत्र के साथ उन्होंने नाज और रुपए भेजे ।
शीतला ने उत्तर दिया--गैया; क्षमा करो | जब तक जीडँगी, तुम्हारा यश गाऊँगी । तुमने मेरी ड्बती नाव पार लगा दी।
(४) कई महोने बोत गए। संध्या का समय था | शोतला अपनी
मैना को चारा चुगा रही थी | उसे सुरेश नेपाल से उसी के चास्ते लाए थे । इतने मे सुरेश आकर आँगन में बैठ गए।
शीतला ने पूछा--“कहाँ से आते हो, सैया ९”
सुरेश--गया था जरा थाने | कुछ पता नही चला। र॑गून मे पहले कुछ पता मिला था । व्द को सालूम हुआ कि चह कोई और आदमी है। क्या करूँ ? इनाम और बढ़ा दूँ?
शोतला--तुम्हारे पास रुपए बढ़े हैं; फूँको | उनकी इच्छा होगी, तो आप ही आवेंगे।
सुरेश-एक बात पूछे) चताओगो १? किस वात पर तुमसे झूठे थे ९
शोनल्ला--कुद्ध नहों, मेने यहो क॒दा कि सुफे गहने बनवा
धर प्रेम-पंचमी
दो। कहने लगे, मेरे पास है क्या । मैंने कहा ( जजाकर ), तो ब्याह क्यों किया ? बस बार्तो-ही-बातों में तकरार मान गए ।
इतने में शीतला की सास आ गई। सुरेश ने शीतत्ञा को सा ओर भाइयों को उनके घर पहुँचा दिया थो, इसलिये यहाँ अब शांति थी। सास ने बहू की बात सुन ली थी । ककंश स्वर से बोली--बेटा+' तुमसे क्या परदा है। यह सहारानी देखने ही को गुलाब का फूल हैं, अंदर सब काँटे हैं । यह अपने बनाव- सिगार के आगे विमल की दांत ही न पूछतो थी। बेचारा इस पर जान देता था ; पर इसका मं ह ही न सीधा होता था । प्रेम तो इसे छू नहीं गया। अंत को उसे देश से निकालकर इसने दम लिया !
शीतला ने रुष्र होकर कहा--क्या वही अनोखे धन कमाने घर से निकले हैं ? देश-विदेश जाना मरदो का काम ही है।
सुरेश--योरप मे तो धन-भोग के सिवा ख्रो-पुरुष मे कोई संबंध ही नहीं होता । बहन ने योरप में जन्म लिया होता, तो हीरे-जवाहिर से जगमगाती होती । शीतलाः अब तुस ईश्वर से यही कहना कि सुदरता देते हो, तो योरप में जन्म दो ।
शीतला ने व्यथित होकर कहा--'“जिनके भाग्य मे लिखा है, वे यही सोने से लो हुई हैं। मेरी भाँति सभी के करस थोड़े ही फूट गए है ।”
सुरेशसिह को ऐसा जान पड़ा कि शीतला की मुख-कांति सलिन हो गई है। पति-वियोग मे भी गहनो के लिये इतनी
आभूषण ४३
लालायित है ! बोले--“अच्छा, मैं तुम्हें गहने बनवा दूगा।”?
यह वाक्य कुछ अपमान-सुूचक सर्वर में कहा गया था; पर शीतला की आँखें आनंद से सजल हो आईं, कैठ गठ्द हो गया । उसके हृदय-नेत्रो के सामने मंगला के रत्ल-जटित आभूषणों का चित्र खिच गया । उसने कृतज्ञता-पूर्ण दृष्टि से सुरेश को देखा । मूह से कुछ न बोली ; पर उसका प्रत्येक अंग कह रहा था-- ध्पें तुम्हारी हू ७
(६)
कोयल आम की डालियों पर बैठकर, मछली शीतल निर्मल जल मे क्रीडा करके और म्ग-शावक विस्तृत हरियालियों मे छलाँगें भरकर इतने प्रसन्न नही होते, जितना मंगला के आमू- षर्णों को पहनकर शीतला प्रसन्न हो रही है। उसके पेर जमीन पर नहीं पड़ते | वह आकाश में विचरती हुई जान पड़ती है। वह दिन-भर आइने के सासने खड़ी रहती है; कभी केशों को सँवारती है, कभी सुरमा लगाती है । कुहरा फट गया ओर निर्मल स्वच्छ चाँदनी निकल आई है। वह घर का एक तिनका भी नहीं उठाती | उसके स्वभाव मे एक विचिन्न गव का संचार हो गये है।
लेकिन झँगार क्या है ! सोई हुईं काम-बासना को जगाने का घोर नादू--उद्दीपन का मंत्र | शीतला जब नख-शिख से सज- कर बैठती है, तो उसे प्रब्ल इच्छा होती है कि मुझे फोई देखे।
है प्रेम-पचसी
वह द्वार पर आकर खड़ी हो जाती है। गाँव को ख्रियों को प्रशंसा से उसे संतोष नहीं होता। गाँव के पुरुषों को वह आंगार-रस-विहीन सममती है। इसलिये सुरेशसिह को बुलाती है। पहले वह दिन में एक बार आ जाते » ; अब शीतला के बहुत अनुनय-विनय करने पर भी नहीं आते |
पहर रात गई थी । घरों के दीपक बुक चुके थे। शीतला के चर में दोपक जल रहा था | उसने कुँअर साहब के बगीचे से बेले के फूल मेँ गवाए थे, ओर बैठी हार गूँथ रही थी--अपने लिये नहीं) सुरेश के लिये। प्रेस के सिवा एहसान का बदला देने के लिये उसके पास ओर था ही क्या ९
एकाएक कुत्तों के भू कने की आवाज सुनाई दी, और दस- भर से विमलसिह ने सकान के अंदर कुदम रक्खा । उनके एक हाथ में संदूक थी, दूसरे हाथ मे एक गठरी | शरीर दुबंल; कपड़े मैले, दाढ़ी के बाल बढ़े हुए, मुख पीला ; जैसे कोई केदी जेल से निकलकर आया हो । दीपक का ग्रकाश देखकर वह शीतला के कमरे की तरफ चले । मैना पिजरे मे तड़फड़ाने लगी | शोतल्ा ने चोककर सिर उठाया। घबराकर बोली--“कोन ९” फिर पहचान गई । तुरंत फूलों को एक कपड़े से छिपा दिया। उठ खड़ी हुईं, और सिर कुफाकर पूछा--“इतनी जल्दी सुध ली !”
विमल ने कुछ जवाब न दिया । विस्मित हो-होकर कभी शोतला को देखता और कभी घर को | मानो किसी नए संसार में पहुँच गया है। यह वह अधखिला फूल न था; जिसकी पँख-
आभूषण ४५
ड़ियाँ अनुकूल जल-वायु न पाकर सिमट गई थी। यह पूर्ण बिकसित कुसुम था--ओस के जलकणों से जगमगाता और वायु के कोकों से लहराता हुआ | विमल उसकी सुद्रता पर पहले भी मुग्ध था। पर यह ज्योति वह अग्नि-ज्वाला थी, जिघसे हृदय मे ताप ओर आँखों मे जलन होती थी। ये आभूषण, ये बस्र: यह सजावट ! उसके सिर में चकर-सा आ गया। जमीन पर बैठ गया । इस सूयमुखी के सामने बैठते हुए उसे लज्जा आती थी । शीतल्ा अभी तक स्त॑ंभित खड़ी थी। वह पाती लाने नही दीड़ी, उसने पति के चरण नही धोए, उसके पंखा तक नही मत्ता । वह हतबुद्धि-सी हो गई थो | उसने कल्पनाओं की कैसी सुरम्य वाटिका लगाई थी ! उस पर तुषार पड़ गया ! वास्तव मे इस सल्िन-बद्न, अद्ध-सग्न पुरुष से उसे घृणा हो रही थी | यह घर का जुमीदार विमत्न न था । वह सजदूर हो गया था। मोटा कास सुखाकात पर असर डाले विना नहीं रहता । मजदूर सुद्र वस्चों मे भी मजदूर ही रहता है ।
सहसा विमल की मा चोको । शीतला के कमरे मे आई; तो विसल को देखते ही मातृ-स्नेह से विहल होकर उसे छात्ती से लगा लिया। विमल ने उसके चरणो पर सिर रक्खा । उसकी आँखो से आँसुओं की गरमसनगरम बूंद निकल रही थी। मा पुलकित हो रही थी । सुख से बात न निकलती थी ।
एक क्षण मे विसल ने कहा--अम्सा !
कंठ-ध्वनि ने उसका आशय प्रकट कर विया ।
जा
४६ प्रेम-पंचमी
सा ने प्रश्न समझकर कहा--नही बेटा, यह बात नहीं है ।
विसल--यह देखता क्या हूँ ?
मा-स्वभाव ही ऐसा है; तो काई कया करे ?
विमल--सुरेश न मेरा हुलिया क्यो लिखाया था ?
मा--तुम्हारों खोज लेने के लिये। उन्होने दया न को होतो, तो आज घर में किसो को जोता न पाते ।
विमल--बहुत अच्छा हता ।
शीतला ने ताने से कह्या--अपनो आर से ते! तुमने सबको मार हो डाला था । फूलो को सेज बिल्ला गए थ न ?
विमल--अब तो फूलों को सेज हं। बिछी हुई देखता हूँ ।
शीतला--तुम किसो के भाग्य के विधाता हो ९
विमलसिह उठकर क्रोध से काँपता हुआ बाला--अम्मा, मुझे यहाँ से ले चलो । मे इस पिशाचिनी का से ह नहीं देखना चाहता । मेरी आँखों में खुन उतरता चला आता है। मैंने इस कुल-कल्नंकिनी के लिये तोंन सात तक जो कठिन तपस्या की है, उससे इश्वर मिल जाता ; पर इसे न पा सका !
यह कहकर वह कमरे से निकल आया, और मा के कमरे में जेट रहा । मा ने तुरंत उसका मुँह और हाथ-पर घुल्लाए। वह चूल्हा जल्लाकर पूरियाँ पकाने लगी | साथ-साथ घर की विपत्ति- कथा भी कहती जाती थी। विमल के हृदय में सुरेश के भ्रति जो विरोधाग्नि अज्वलित हो रही थो, वह शांत हो गई; लेकिन हृदय-दाह ने रक्त-दाह का रूप धारण किया । जोर का
आभूषण ७
चुस्नार चढ़ आया | लँबो यात्रा की थकन ओर कष्ट तो था ही; बरसों के कठिन श्रम और तप के बाद यह मानसिक संताप ओर भी दुस्सह हो गया।
सारी रात वह अचेत पड़ा रहा । मा बैठी पंखा कलती ओर रोता रहो । दूसरे दिन भी वह बेहोश पड़ा रहा । शीतला उर्सके पास एक क्षण के लिये भी न आई । “इन्होने मुझे कौन सोने के कोर खिला दिए है, जो इनको धोस सह । यहाँ तो “जैसे कंता घर रहे; वैसे रहे विदेस ।' किसी को फूटो कोड़ी नही जानतो । बहुत ताव दिखाकर तो गए थे। कया लाद लाए ९१”
भध्या के समय सुरेश को खबर मिलो। तुरंत दोंड़े हुए खाए। आज दो सहीने के बाद उन्होंने इस घर में कदस रकक्खा | विमल ने आँखे खोली, पहचान गया । आँखा से आओसू बहन लगे। सुस्श के मुखारबिंद पर दया की ज्योति मलक रही थी | विमल ने उनके बारे में जो अलुचित संदेह किया था, उसके लिये वह अपने को घिक्कार रहा था ।
शांतला ने ज्या हो सुना कि सु रेशसिह आए हैं, तुरंत शाशे के सामने गई, केश छिटका लिए और विषाद की मूति बनी हुईं विमल के कमरे मे आई। कहद्दों तो विसल की आँखें बंद थीं, मृच्छित-सा पड़ा था; कहाँ शोतत्ला के आते ही आँखे खुल गईं । अग्निमय नेत्रों से उसको ओर देखकर वोला--अभो आई है ? आज के तीसरे दिन आना । कँँअर साहब से उस दिन फिर भट हो जायगी।
ध्र्प प्रेम-पंचमी
शीतला उलटे-पॉव चली गई । सुरेश पर घड़ों पानी पढ़ गया। मन में सोचा--कितना रूप-लावण्य है; पर कितना विषाक्त ! हृदय को जगह केवल खूंगार-लालसा !
रोग बढ़ता ही गया । सुरेश ने डॉक्टर बुलवाए। पर सृत्युदेव ने किसी की न मानी । उनका हृदय पाषाण है। किसी भाँति नहीं पसीजता | कोई अपना हृदय निकालकर रख दे, आँखुओं की नदी बहा दे ; पर उन्हे दया नहीं आती । बसे हुए घर को उजाड़ना। लदरराती हुईं खेती को सुखाना उनका कास है। और, उनकी निदंयता कितनी विनोद्मय है ! वह नित्य नए रूप बदलते रहते हैं । कभी दामिनी बन जाते हैं; तो कभी पुष्प- साला । कभी सिह बन जाते हैं, तो कभी सियार। कभो अग्नि के रूप मे दिखाई देते हैं, तो कभो जल के रूप मे ।
तीसरे दिन) पिछली रात को; विसल की मानसिक पीड़ा और हृदय-ताप का अंत दही गया । चोर दिन को कभी चांरी नहीं करता । यम के दूत प्राय. रात का ही सबकी नजर बचाकर आते है, और प्राण-रत्न को चुरा ले जाते है। आकाश के फूल मरमाए हुए थे। वृक्ष-समृह स्थिर थे; पर शोक में सरल, सिर झुकाए हुए। रात शोक का बाह्य रूप है । रात मृत्यु का क्रोड़ा- च्षेत्र है। उसी समय विसल के घर से आतं-नाद सुनाई दिया--
वह नाद, जिसे सुनने के लिये उंत्युदेंव विकल रहते हें ।
शीतला चौक पड़ी) और घबराई हुई मरण-शय्या की ओर
चली । उसने सत-देह पर निगाह डाली, ओर भयभीत होकर
आभूषण ४६
एक पग पीछे हट गई । उसे जान पड़ा, विमलसिह्द उसकी ओर अत्यंत तीत्र दृष्टि से देख रहे हैं | बुके हुए दीपक में उसे भय॑- कर ज्योति दिखाई पड़ो । बह मारे भय के वहाँ ठहर न सकी । द्वार से निकल ही रही थी कि सुरेशसिंह से भेंट हो गई । कातर स्वर में बोली--“मुझे यहाँ डर लगता है ।” उसने चाहा कि रोती हुईं इनके पेरों पर गिर पड़े; पर वह अलग हट गए । (७)
जब किसी पथिक़ को चलते-चलते ज्ञात होता है कि में रास्ता भूल गया हूँ, तो वह सीधे रास्ते पर आने के लिये बड़े वेग से चलता है। मुँफलाता है कि में इतना असावधान क्यों हो गया ? सुरेश भी अब शांति-माग पर आने के लिये विकल हो गए । मंगला की स्मेहमयी सेवाएँ याद आने लगी । हृदय में वास्तविक सोद्योपासना का भाव उदय हुआ। - समे कितना प्रेम, कितना त्याग था, कितनी क्षमा थी ! उसको अतुल पति- भक्ति को याद करके कभी-कभी वह तडप जाते। आह ! मेंने घोर अत्याचार किया। ऐसे उज्ज्वल रत्न का आदर न किया । मे यही जड़वत् पड़ा रहा, और सेरे सामने ही लक्ष्मी घर से निकल गईं ! मंगला ने चलत-चलते शोतला से जो बातें कही थी, व उन्हे मालूम थी । पर उन बातों पर विश्वास न होता था। मंगला शांत ग्रकृति को थी; वह इतनी उद्द'डता नही कर सकती । उप्तमे क्षमा थी , वह इतना विद्वेष नहीं कर सकती । उनका मन कहता था कि जोती है? और कुशल से है । उसके
१० प्रेस-पंचमी
मायकेवालों को कई पत्र लिखे । पर वहाँ व्यंग्य और कट वार्क्यों के सिवा और क्या रक्खा था ? अंत को उन्होने लिखा--“अब उस रल्न को खोज मे मे स्वयं जावा हूँ । या तो लेकर ही आऊँगा। या कही मुँह मे कालिख लगाकर डूब मरूंगा ।”?
इस पत्र का उत्तर आया--““अच्छी बात है; जाइए, पर यहाँ से होते हुए जाइएगा । यहाँ से भी कोई आपके साथ चला जायगा ।”
सुरेशसिह को इन शब्दों मे आशा की झलक दिखाई दी ! उसी दिन प्रस्थान कर दिया । किसी को साथ नही लिया ।
सुसराल् मे किसी ने उनका प्रेममय स्वागत नहीं किया | सभी के मुँह फूले हुए थे | ससुरजी ने तो उन्हें पति-धम पर एक लंबा उपदेश दिया ।
रात को जब वह भोजन करके लेटे, ता छोटी साली आकर बेठ गई, ओर मुसकिराकर बोली--“जोजाजी, कोई सुंदरी अपने रूप हीन पुरुष का छोड़ दे! उसका अपमान करे तो आप उसे क्या कहेगे १” |
सुरेश--( गभीर स्वर से ) कुटिला !
साली--और ऐसे पुरुष को, जो अपनी रूप-हीन सत्री को स््याग दे ९
सुरेश-पशु !
साली--ओर जो पुरुष विद्वान् हो ९
आभूषण ४९
सुरेश--पिशाच !
साली--( हँसऋर ) तो में भागती हूँ। मुझे आपसे डर लगता है ।
सुरेश--पिशाचों का प्रायश्चित्त भी तो स्वोकार हो जाता है।
साली--शत यह है कि प्रायश्चित्त सच्चा हो ।
सुरेश--यह तो वह अंतर्यामी ही जान सकते हैं ।
साली--सच्चा होगा। तो उसका फल भी अवश्य मिलेगा | 'सगर दीदी को लेकर इधर ही से ल्ॉटिएगा ।
सुरेश की आशा-नोका फिर डगमगाई। गिड़गिड़ाकर बोले-- “अगो, इश्वर के लिये मुझ पर दया करो, में बहुत दुखी हैँ । साल-भर से ऐसा कोई दिन नही गया कि मै रोकर न सोया हूँ।”
प्रभा ने उठकर कहा--“अपने किए का कथा इलाज ? जाती हूँ, आराम कीजिए ।”
एक ज्ञण में शोतला की माता आकर बेठ गई, और बोली-- “बेटा, तुमने तो बहुत पढ़ा-लिखा कै देस-बिदेस घूम आए हो, सुंदर बनने की कोई दवा कही नही देखी १”
सुरेश ने विनय-पूवेक कहा--“माताजी, अब इश्वर के लिये और लज्जित न कीजिए ।”
समाता--तुसने तो सेरो बेटी के प्राण ले लिए ! में क्या तुम्दे लज्ित करने से भी गई ! जी मे तो था कि ऐसी-ऐसी सुनाऊँगी कि तुम भी याद करोगे ; पर मेरे मेहमान हो, क्या जलाऊँ १ आराम करो ।
झरे प्रेम-पंचमी
सुरेश आशा और भय की दशा मे पड़े करवट्टें बदल रहे थे कि एकाएक द्वार पर किसा ने धोरे से कहा--“जाती क्यो नहीं, जागते तो है !” किसी ने जवाब दिया--“लाज आती है ।”
सुरेश ने आवाज़ पहचानी । प्यासे को पानो मित्र गया । एक क्षण मे मंगला उनके सम्मुख आईं, ओर सिर क्रुकाकर खड़ी हो गई | सुरेश का उसके सुख पर एक अनूठी छवि दिखाई दी, जेसे कोई रोगी स्वास्थ्य-लाभ कर चुका हो ।
रूप वही था, पर आँखे ओर थीं ।
राज्य-भक्त
संध्या का समय था। लखनऊ के बादशाह नासिरुददोन अपने मुसाहबो ओर दरबारियों के साथ बाग की सैर कर रहे थे । उनके सिर पर रल्लन-जटित मुकुट को जगह ऑगरेज़ी टोपी थी। वस्र भी अँ गरेजी ही थे | मुसाहबों मे पॉच ऑअगरेज थे । उनमें से एक के कंधे पर सिर रखकर बादशाह चल रहे थे। चार-पाँच हिदुस्थानी भी थे। उनमे एक राजा बख्तावरसिंह थे। वह बादशाद्दी' सेा के अध्यक्ष थे। उन्हे सच लोग जेन- रल्! कहा करते थे। वह अधेड़ आदसी थे। शरोर खूब रगठा हुआ था । लखनवी पहनाव उन पर बहुत सजतवा था। मुख से विचारशीलता मलक रही थी । दूसरे सहाशय का नाम रोशनुद्दोला था । यह राज्य के प्रधान मंत्री थे। बड़ी बड़ो सुछें ओर नाटा डोल था, जिसे ऊँचा करने के लिये वह 'तनकर चलते थे। नेत्रों से गव टपक रहा था । शेष लोगों मे एक कोतवाल था, और दो बादशाह के रक्षक | यद्यपि अभी १ध्वी शताब्दी का प्रारंभ ही था। पर बादशाह ने आऑगरेजो रहन-सहन अखितयार कर लिया था। भोजन भी प्रायः अँगरेजी ही करते थे। अ गरेज़ों पर उनका असीम विश्वास था। वह सदैव उनका पक्ष लिया करते। मजाल न थी कि
४७ प्रम-पंचमी कोई बड़े-सेबडा राजा या राज-कर्मचारी किसी अँगरेज से
बराबरी करने का साहस कर सके । अगर किसी में यह हिम्मत थी; तो वह राजा बख्तावरसिह थे। उनसे कंपनी का बढ़ता हुआ अधिकार न देखा जाता था; कंपनी को वह सेना जिसे उसने अवधनराज्य की रक्षा के लिये लखनऊ में नियुक्त किया था, विन-दिन बढ़ती जाती थी। उसी परिसाण मे सेना का व्यय भी बढ रहा था। राज-दरबार उसे चुका न सकने के कारण कंपनी का ऋणी होता जाता था | बादशाही सेना की दशा हीन से हीनतर होती जाती थी । उसमें न संगठन था, न बल । बरसों तक सिपाहियों का वेतन न मिलता । शस्र सभी पुराने ढंग के, वरदी फटी हुई, कवायद का नाम नहीं | कोई उनका पूछनेवाला न था। अगर राजा बख्तावरसिह वेतन-व्ृद्धि या नए शज्नों के संबंध में कोई प्रयत्न करते, तो कंपनी का रेज़िडेट उसका घोर विरोध ओर राज्य पर विद्रोहात्मक शक्ति-संचार का दोषारोप करता | उधर से डाँट पड़ती, तो बादशाह अपना गुस्सा राजा साहब पर उतारते | बादशाह के सभी अगरेज़ मुसाहब राजा साहब से शैंकित रहते, ओर उनको जड़ खोदने का प्रयास करते थे । पर वह राज्य का सेवक एक ओर से अबहेलना ओर दूसरी * ओर से घोर विरोध सहते हुए अपने कतव्य का पालन करता जाता था | मज़ा यह कि सेना भी उनसे संतुष्ट न थी। सेना में अधिकांश लखनऊ के शोहदे और गुंडे भरे हुए थे। राजा
राज्य-भक्त बे
साहब जब उन्हे हटाकर अच्छे-अच्छे जवान भरती करने को चेष्टा करते, तो सारी सेना मे हाहाकार सच जाता | लोगों को शंका द्ोतो कि यह राजपूर्तों की सेना बनाकर कहीं राज्य ही पर तो हाथ नही वढाना चाहते ? इसलिये मुसलमान भी उनसे वदगूमान रहते थे । राजा साहब के मन में वार-बार प्रेरणा होती कि इस पद् को त्यागकर चले जाय, पर यह भय उन्हें रोकता था कि मेरे हटते ही ऑगरज़ों को बन आवेगी+ ओर बादशाह उनके हाथों में कठपुतली बन जायेंगे ; रद्दी-सही सेना के साथ अवध-राज्य का अस्तित्व भो मिट जायगा | अत- एवं, इतनी कठिनाईयों के होते हुए भी, चारो ओर वैर-विरोध से घिरे होने पर भी, वह अपने पद से हटने का निश्चय न कर सकते थे। सबसे कठिन समस्या यह थी कि रोशनुद्दोला भी राजा साहब से खार खाता था । उसे सदेव शंका रहती थी कि यह मराठों से मैत्री करके अवध-राज्य को मिटाना चाहते हैं । इसलिये वह भी राजा साहब के पत्येक काण मे बाधा डालता रहता । उसे अब भी आशा थी कि अवध का मुसलमानी राज्य अगर जीवित रह सकता है) तो आगरेजों के संरक्षण मे; अन्यथा चह अवश्य हिदुओ की बढ़ती हुई शक्ति का ग्रास बच जायगा। वास्तव मे बख्तावरसिह की दशा अत्यंत करुण थी। वह अपनी चतुराई से जिह्ना की भाँति दॉँतों के बीच में पड़े हुए अपना काम किए जाते थे । यों तो वह स्वभाव से अक्खड़ थे, पर अपना कास निकालने के लिये मधुरता ओर मदुलता, शील
ध्द प्रेम-पंचमी ओर विनय का आवाहन भी करते रहते थे। इससे उन्तके व्यर्व॑- हार से कृत्रिसता आ जाती, ओर वह शत्र॒ओं को उनकी ओरें से और भी सशंक बना देती थी |
बादशाह ने एक अँगरेजु सुसाहब से पूछा--“तुसका मालूम है, मे तुम्हारी किवनो खातिर करता हैँ ? मेरो सल्तनत में किसी की सजाल नही कि वह किसी ऑगरेज को कड़ी निगाहो से देख सके ।”
अँगरेंज सुसाहब ने सिर कुकाकर जवाब दिया--/हम हुजूर की इस मिहरबानी को कभी नही भूल सकते ।”
बादशाह--इमामहुसेन को कसम, अगर यहाँ कोई आदमी तुम्हे तकलीफ दे तो मे उस फौरन् जिदा दीवार में चुनवा दूं ।
बादशाह की आदत थी कि वह बहुधा अपनो अगरेजी टोपी हाथ मे लेकर उसे डँँगलो पर नचाने लगते थे। रोज़ नचातें- नचाते टोपी मे डेंगली का घर हो गया था । इस समय जो उन्होंने टोपी उठाकर उँगली पर रकक््खी, तो टोपी मे छेद हो गया । बादशाह का ध्यान अँगरेजो को तरफ था। बख्तावरसिह बादशाह के मेँह से ऐसी बाते सुनकर कबाब हुए जाते थे। उक्त कथन मे कितनो खशामद, कितनी नीचता और अवध को प्रजा तथा राजा का कितना अए्मान था ; और लाग तो टोपी का छिद्र देखकर हँसने लगे, पर राजा बख्तावरसिह के मं हैं से अनायास निकल गया--/हुजूर, ताज मे सूराख हो गया /
राजा साहब के शत्रओं ने तुरंत कार्नों पर डँंगलियां रख
राज्यन्यक्त भ््ड
ज्ञीं। बादशाह को भी ऐसा मालूम हुआ कि राजा ने मुझ पर व्यंग्य किया । उनके तेवर बदल गए। आँगरेजों और अन्य सभासदों ने इस प्रकार काना-फूसी शुरू की, जैसे: कोई महान् अनथ हो गया हो। राजा साहब के मुँह से अनर्गल शब्द अवश्य निकले थे। इसमे कोई संदेह नहीं था | संभव है, उन्होंने जान- चूमकर व्यंग्य न किया हो, उनके दुःखी हृदय ले साधारण चेतावनी को यह तीम्र रूप दे दिया हो; पर बात बिगड़ ज़रूर गई थी। अब उनके शत्रु उन्हे कुचलने के ऐसे खुद्र अवसर को हाथ से क्यो जाने देते ?
राजा साहब ने सभा का यह रंग देखा, तो खन सर्द हो गया । समझ गए, आज शत्रुओ के पंजे मे फेस गया, और ऐसा बुरा फँसा कि भगवान् हो निकाले, तो निकल सकता हूँ।
बादशाह ने कोतवाल से लाल आँखे करके कहा--“इस नमकहराम को केद् कर लो, ओर इसी वक्त इसका सिर जड़ा दो। इसे मालूम हो जाय कि बादशाहों से बेअदबो करने का क्या नतीजा होता है ।”
कोतवाल को सदसा 'जेनरल” पर हाथ वढाने की हिम्मत न पड़ी । रोशलुद्दोला ने उससे इशार से कहा--“खड सोचते क्यो हो; पकड़ लो, नही तो तुम भी इसी आग मे जल जाओगे ।”
मट कोतवाल ने आगे वढुकर वख्तावरसिह को गिरपतार कर लिया । एक ज्ञण मे मुश्के कस दो गई । लोग उन्हे चारो आर से घेरकर कत्ल करने ले चले।
४८ प्रेम-पंचमी
बादशाह ने मुसाहबों से कहा--"मे भी वही चलता हूँ। ज़रा देखूँगा कि नमकहरामो की लाश क्योकर तड़पतो है ।”
कितनी घोर पशुवा थी ! यही प्राणी जरा देर पहले बादशाह का विश्वास-पात्र था !
एकाएक बादशाह ने कहा--“पहले इस नमकहराम को खिलअत उतार ला । में नही चाहता कि मेरी खिलअत की, बेइज्जती हो ।”
किसको सजाल थी, जो ज़रा भी जवान हिला सकता । सिपाहियों ने राजा साहब के वख्र उत्तारने शुरू किए। दुर्भाग्य- वश उनकी एक जेब से पिस्तोल निकल आई । उसकी दोनो नालियाँ भरी हुई थीं। पिस्तोल देखते ही बादशाह को आँखों से चिनगारियाँ निकलने लगीं । बोले--"क़सम है हज़रत इमामहुसेन की; अब इसकी जाँबरूशी नही करूँगा। मेरे साथ भरी हुई पिस्तौल की क्या ज़रूरत ! ज़रूर इसकी नीयत में फितूर रहता था । अब मे इसे कुत्तों से नुचवाऊँगा | ( झुसाहबों की. तरफ़ देखकर ) देखी तुम लोगों ने इसकी नीयत ! में अपनी आस्तीन मे साँप पाले हुए था। आप लोगों के खयाल में इसके पास भरी हुई पिस्तोल का निकलना क्या माने रखता है १”
अगरेजों को केवल राजा साहब को नीचा दिखाना मंजर था। वे उन्हें अपना मित्र बनाकर जितना कास निकाल सकते थे, उतना उनके मारे जाने से नहीं । इसी से एक अगरेज सुसा- हब ने कहा--“मुमे तो इसमे कोई गरेरमुनासिब बात नही मालूम
राज्य-भक्त श्द
होती । जेनरल आपका बाडी-गा्ड ( रक्षक ) है। उसे हमेशा हथियार-बद रहना चाहिए। खासकर जब आपकी खिदमत मे हो । न मालूम, किस वक्त जरूरत आ पडे |”
दूसरे ऑगरेज़ मुसाहबों ने भी इस विचार की पुष्टि की बादशाह के क्रोध की ज्वाला कुछ शांत हुई | अगर ये ही बातें किसी हिदुस्थानी मुसाहब की जबान से निकली होतीं; तो उसकी जान की खैरियत न थी। कदाचित् अँगरेज़ों को अपनी न््याय- परता का नमूना दिखाने ही के लिये उन्होंने यह प्रश्न किया था । बोले--“कसम हज़रत इमाम की, तुम सब-के-सब शेर के मुँह से उसका शिकार छीनना चाहते हो ! पर मै एक न मारनूँगा)- बुलाओ कप्तान साहब को। में उनसे यही सवाल करता हूँ अगर उन्होंने भी तुम लोगो के खयाल की ताईद की, तो इसकी जान न छूँगा । और, अगर उनकी राय इसके खिलाफ हुई, तो- ' इस मक्कार को इसी घह़ जहज्ञम भेज दूँगा। सगर खबरदार, कोई उनकी तरक किसी तरह का इशारा न करे; वर्ना में जरा- भी रू-रियायत न करूँगा । सब-के सब सिर ऊुकाए बैठे रहे ।”
कप्तान साहब थे तो राजा साहब के आउरदे, पर इन दिनों बादशाह की उन पर विशेष कृपा थी | वह उन सच्चे राज्य-
भक्तों में से थे, जो अपने को राज! का नही, राज्य का सेवक सम-- भते हैं । वह दरबार से अलग रहते थे । बादशाह उनके कामों से. बहुत संतुष्ट थे। एक आदमी तुरंत कप्तान साहब को बुला. लाया । राजा साहब को जान उनकी मुट्ठी मे थी। रोशनुद्देला:
६० प्रेम-पंचमी को छोड़कर शायद् एक व्यक्ति भी ऐसा न था,,जिसका हृदय आशा ओर निराशा से न धड़क रहा हो । सब मन से भगवान् से यही ग्राथना कर रहे थे कि कप्तान साहब किसी तरह से इस समस्या को समस्त जाये। कप्तान साहब आए | उड़ती हुई दृष्टि से सभा की ओर देखा। सभी की आँखें नीचे कुकी हुई थीं। वह कुछ अनिश्चित भाव से सिर क्रुकाकर खड़े हो गए। बादशाह ने पूछा--“मेरे मृूसाहवों को अपनी जेब मे भरी हुईं पिस्तोल रखना म॒नासिब है, या नहीं १” दरवारियों की नीरवता, उनके आशंकित चेहरे ओर उनकी 'चिता-युक्त अधीरता देखकर कप्तान साहब को वतंसान समस्या की कुछ टोह मिल गई | वह निर्भीक भाव से बोले--“हुजूरः मेरे खयाल मे तो यह उनका फर्ज है। बादशाह के दोस्त-दुश्मन सभी होते हैं; अगर मुसाहव क्लोग उनकी रक्षा का भार न लेंगे, तो कौन लेगा ? उन्हें सिफ पिस्तोल ही नही, ओर भी छिपे हुए हथियारों से लैस रहना चाहिए। न-जाने कब हथियारों को जरूरत आ पड़े, तब वे ऐन वक्त, पर कहाँ दोड़ते फिरगे।” राजा साहब क जीवन के दिन बाकी थे । बादशाह ने निराश हाकर कहा--“रोशन, इसे कत्ल सत करना; काल-कोठरी मे केंद् कर दो | मुकसे पूछ बग्ेर इसे दाना-पानी कुछ न दिया जाय । जाकर इसके घर का सारा माल-असबाब जुब्त कर लो। और आारे खानदान को जेल मे बंद करा दो । इसके मकान को दीवारें जमीदोज़ करा देना | घर मे एक फूटी हाँडी भी न रहने पाचे ।”
राज्य-सक्त ६१
इससे तो कही अच्छा यहो था कि राजा साहब हो की जान जातो | खानदार्न को बेइज्जती तो न होती, महिलाओं का अप- मान तो न हाता, द्रिद्रता की चोटे तो न सहनी पड़ती ! विकार को निकलने का साग नही मिलता, तो वह सारे शरीर में फेल जाता है। राजा के प्राण तो बचे, पर सारे खानदान को विपत्ति सेडालकर ! . ,
रोशलुद्दो्षा को मु ह-माँगी मुराद मिली । उसकी इर्षा कभी इतनी संतुष्ट न हुई थी । वह मग्न था कि आज वह काँटा निकल गया, जो बरसों से हृदय में चुभा हुआ था | आज हिदू- राज्य का अंत हुआ । अब मेरा सिक्का चलेगा ।-अब में समस्त राज्य का विधाता हूँगा। संध्या से पहले हो राजा साहब की सारी स्थावर और जंगम संपत्ति कुक हो गई । बृद्ध माता-पिता; सुकोमल रमणियाँ, छोटे-छोटे बालक; सब-के-सब जेल भे केद् कर दिए गए । कितनी करुण दशा थी ! वे महिलाएँ, जिन पर कभो देवताओं को भी निगाह न पडी थी, खुले मेँ ह, नंगे पैर, पाँव घसीटती, शहर की भरी हुई सड़कों और गलियों से होती हुईं, सिर कुकाए, शोक-चित्रों की भाँति; जेल की तरफ चली जातो थी। सशख्त्र सिपाहियों का एक बड़ा दल साथ था। जिस पुरुष के एक इशारे पर कई घंटे पहले सारे शहर मे हलचल मच जाती, उसो के खानदान को यह दुदंशा !
(२) राजा बख्तावरसिह को बंदी-गृह में रहते हुए एक मास बीत:
दर प्रेम-पंचमी
गया। वहाँ उन्हे सभी प्रकार के कष्ट दिए जाते थे। यहाँ तक कि भोजन भी यथासमय न सित्ता था । उनके परिवार को भी असह्य यातनाएं दी जातो थीं | लेकिन राजा साहब को बंदी- गृह में एक ग्रकार की शांति का अनुभव हाता था। वहाँ प्रति चुणु यह खटका तो न रहता था कि बादशाह मेरी किसी बात से नाराज न हो जाय ; मुसाहव लोग कहीं मेरी शिकायत तो नही कर रहे है। शारीरिक कष्ठो का सहना उतना कठिन नही, जितना कि सानसिक कष्टो का | यहाँ सब तकलीफ थी, पर सिर पर तलवार तो नही लटक रही थी । उन्होंने सन मे निश्चय किया कि अब चाहे बादशाह मुझे मुक्त भी कर दें, मगर मे राज-काज से अलग ही रहूँगा। इस राज्य का सूर्य अस्त होनेवाला है; कोई मानवी शक्ति उसे विनाश-निशा में लीन होने से नही रोक सकती । ये उसो पतन के लक्षण है; नहीं तो क्या मेरी राज्य- भक्ति का यही पुरस्कार मसिज्ञना चाहिए था! मैंने अब तक कितनी कठिनाइयों से राज्य की रक्षा की है, यह भगवान् ही जानते हैं. । एक तो बांदुशाह की निरंकुशता, दूसरी ओर बल- वान् और युक्ति-संपन्न शह्नओं की कूटनीति--इस शिज्ञा और भँवर के बीच में राज्य की नौका को चलाते रहना कितना कष्ट- साध्य था ! शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा होगा, जिस दिन मेरा चित्त प्राण-शंका से आंदोलित न हुआ हो। इस सेवा, भक्ति और तल्लीनता का यह पुरस्कार है! मेरे मुख से व्यंग्य शब्द अवश्य तज्तिकले; लेकिन उनके लिये इतना कठोर दंड!
शज्य-भसक्त दर
इससे तो यह कहीं अच्छों होता कि मे कत्ल कर दिया गया होता । अपनी आँखों से अपने परिवार को दुर्गति तो न देखता । सुनता हूँ, पिताजी को सोने के लिये चटाई नही दी गई। न- जाने स्त्रियों पर केसे-केसे अत्याचार हो रहे होंगे। लेकिन इतमा जानता हूँ कि प्यारी सुखदा अँत तक अपने सत्तीत्व की रक्षा करेगी; अन्यथा प्राण त्याग देगी | मुझे इन बेड़ियाँ की परवा नही । पर सुनता हूँ; लड़कों के पैरों मे भी बेड़ियाँ डाली गई है । यह सब इसी कुटिल रेशनुद्दोत्ा की शरारत है। जिसका जो चाहे, इस समय सता ले, कुचल ले ; मुझे किसी से काई शिकायत नही । सगवाब् से यहो प्रार्थना है कि अब संसार से उठा ले । मुझे अपने जीवन मे जो कुछ करना था॥ कर चुका, और उसका खब फल पा चुका | मेरे-जेसे आदमी के लिये संसार मे स्थान नही है ।
राजा साहब इन्ही विचारो मे ड्बे थे। सहसा उन्हे अपनी काल-कोठरों की ओर किसी के आने को आहट मिली । रात बहुत जा चुको थी । चारा आर सन्नाटा छाया था और उस अंधकारमय सन्नाटे मे किसी के पैरों की चाप स्पष्ट सुनाई देतो थी। कोई बहुत पाँव दवा-दबाकर चल्ला आ रहा था। राजा साहब का कुलेजा धक-धक +#रने लगा वह उठकर खड़े हो गए। हम निरस्त और प्रतिकार के लिये असमर्थ होने पर भी बैठे-बेठे वारों का निशामा बनना नही चाहते । खड़े हो जाना आत्म-रक्षा का अंतिम प्रयत्न है। कोठरी मे ऐसी कोई वस्तु न
६४ प्रेम-पंचमो
थी, जिससे वह अपनी रक्षा कर सकते | समक गए; अंतिम समय आ गया। शत्रुओं ने इस तरह मेरे प्राण लेने की ठानी है। अच्छा है, जोचन के साथ इस विपत्ति का भी अंत हो जायगा।
एक क्षण में उनके सम्मुख ए5 आादभोी आकर खड़ा हो गया । राजा साहब ने पूछा--“कौन है ?” उत्तर सिल्ला--मैं हैँ; आपका सेवक ।”
राजा--ओ हो) तुम हो कप्तान ! में शंका में पड़ा हुआ था कि कही शत्रुओ ने सेरा वध करने के लिये कोई दूत न भेजा हो ।
कप्तान--शन्रुओं ने कुछ और ही ठानी है। आज बादशाह सलासत की जान बचती नही नजर तअआती |
राजा--अरे ! यह क्योंकर !
कप्तान--जब से आपको यहाँ नज़रबंद किया गया है, सारे राज्य मे हाह्यकार मचा हुआ है। स्वार्थी कमचारियों ने लूट मचा रक्खी है । अँगरेजों की खुदाई फिर रही है।जो जी मे आता है, करते हैं; किसी को मजाल नहीं कि चूँ कर सके। इस एक महीने मे शहर के सेकड़ों बड़े-बड़े रइंस मिट गए। रोशनुद्दोला की बादशाही है। बाजारों का भाव चढ़ता जाता है । बाहर से व्यापारी लोग डर के मारे कोइ जिस ही नही लाते । दूकानदारों से मनमानी रक्तमें महसूल के नाम पर वसूल को जा रहो हैं । ग़ल्ले का भाव इतना चढ़ गया है कि कितने
राज्य-सक्त दर
: द्वो घरों मे चूल्हा जलने की नौबत नही आतो । सिपाहियों को अमी तक तनख्वाह नहीं मिली। वे जाकर दूकानदारों को लूटते हैं। सारे राज्य मे वद-अमलो हा रही है। मैने कई बार यह केफि- यत बादशाह सलामत के कानो तक पहुँचाने की कोशिश की; मगर वह यह तो कह देते हैं कि मे इसकी तहकीकात करूँगा, और फिर बेखबर हो जाते हैं। आज शहर के वहुत-से दूकानदार फरियाद् लेकर आए थे कि हमारे हाल पर निगाह न की गइ, तो हम शहर छोड़कर और कही चले जायेंगे। क्रिस्तानों ने उनका सख्त कहा) धसकाया; लेकिन उन्होंने जब तक अपनी सारी रुंसीबत न बयान कर ली, वहाँ से न हटे । आखिर , जब बादशाह सलामत ने उनको दिलासा दिया, तब कहीं गए ।
राजा--बादशाहू पर इतना असर हुआ, मुझे तो यही ताज्जुब है !
कप्तान--असर-बसर कुछ नहीं हुआ , यह भी उनकी एक दिल्लगी है । शाम को खास मुसाहबा को बुलाकर हुक्स दिया है कि आज मे भेष बदलकर शहर का गश्त करूँगा; तुम लोग भो भेष बदले हुए मेरे साथ रहना । में देखना चाहता हूँ कि रियाया क्यों इतनी घबराई हुईं है। सब लोग सुमसे दूर रहे; किसी को न मालूम हो कि में कोन हैँ । रोशनुद्दोला और पाँचो अगरेज मुसाहब साथ रहेगे।
राजा--तुम्हें क्योंकर यह बात मालूस हो गई
६८ प्रेम-पंचमी
कप्तान--मैंने उसी आअँगरेज़ हज्जास को मिला रक्खा है | द्रचार मे जो कुछ होता है; उसका पता मुझे मिल जाता है। उसी की सिफारिश से आपको खिद्मत में हाजिर होने का मोक़ा ।सत्ञा । धड़ियाल से दस बजते हैं । ग्यारह बजे चलते की तैयारी है। बारह बजते-बजते लखनऊ का तख्त खाली हो जायगा |
राजा--( घब्राकर ) क्या इन सबने उन्हे क़त्लत करने की साजिश कर रक््खी है १
कप्तान--जो नहीं, कत्ल करने से उनकी मंशा पूरो न होगी । वादशाह् को बाजार की सैर कराते हुए गोमती की तरफ ले जायँगे | वहाँ अँगरेज सिपाहियों का एक द्स्ता तैयार रहेगा | वह बादशाह को फोरन् एक गाड़ी पर बिठाकर रेजि- 'डेसी ले जायगा । वहाँ रेजिडेट साहब बादशाह सत्लामत को सल्तनत से इस्तीफा देने पर मजबूर करेगे। उसी वक्त उनसे इस्तीफा लिखा लिया जायगा, और इसके बाद रातोरात उन्हें कलकत्ते भेज दिया जायगा ।
राजा--बड़ा राज़ब हो गया। अब तो वक्तु बहुत कम है; बादशाह सलामत निकल पड़े होंगे ९
कप्तांन--रैज़ब क्या हो गया । इनकी जात से किसे आराम था । दूसरी हुकूमत चाहे कितनी ही खराब हो, इससे तो अच्छी ही होगी ।
राजा--अगरेजों की हुकूमत होगी ९
5.
राज्य-भक्त ६७
कप्तान--अंगरेज इनसे कही बेहतर इंतज़ाम करेंगे ॥
राजा--( करुण स्वर से ) कप्तान ! इश्वर के लिय ऐसी बातें न करो । तुमने सुमसे जरा देर पहले यह केफियत क्यों न बयान की ? हि
कप्तान--( आश्चर्य से ) आपके साथ तो बादशाह ने कोई अच्छा सलूक नही किया !
राजा-मेरे साथ कितना ही बुरा सलूक किया हो, लेकिन एक राज्य की कीमत एक आदमी या एक खानदान को जान से कही ज्यादा हातो है। तुम मेरे पेरो को बेड़ियाँ खुलवा सकते हो !
कप्तान- सारे अवध-राज्य में एक भी ऐसा आदमी न निकलेगा, जो बादशाह को सच्चे दिल से ढुआ देता हा। दुनिया उनके जुल्म से तंग आ गई है ।
राजा-मैं अपनो के जुल्म को ग़्रों की बंदगी से कही चेहतर खयाल करता हूँ । बादशाह की यह हालत ग्रेरों हो के भरोसे पर हुई है। वह इसीलिये किसी की पर्वा नही करते कि उन्हे अं गरेजो को मदद का यकीन है। मे इन फिरंगियो की चालों का ग्रोर से देखता आया हूँ | बादशाह के मिजाज को उन्ही ने बिगाड़ा है । उनको मंशा यहो थो, जा हुआ | रियाया के दिल से बादशाह की इज्जत और मृहव्बत उठ गई । आज सारा मुल्क बगावत करने पर आमादा है।ये लोग इसों
आई
मौके का इंतज़ार कर रहे थे। वह जाते है कि बादशाह
है।
द्प प्रेम-पंचमी
की माजूली ( गद्दी से हटाए जाने ) पर एक आदमी भी आँपू न बहावेगा। लेकिन में जताए देता हूँ कि अगर इस वक्त, तुमने बादशाह को दुश्मनों के हाथों से न बचाया, तो तुम हमेशा के लिये, अपने ही वतन में, ग़लामी की ज॑जीरों में बैंध जाओगे । किसी ग्रेर कौम के चाकर बतकर अगर तुम्हे आफियत (शांति ) भी मिली, तो वह आफियत न होगी; सीौत होगो। गेरों के बेरहम पैरों के नीचे पड़कर तुम हाथ भी न हिला सकोगे, और यह उम्मीद कि कभी हमारे मुल्क में आईनी सल्तनत ( वैध-शासन ) कायस होगी, हसरत का दाग बनकर रह जायगी। नही, सुकमे अभी सुल्क को मुहब्बत बाक़ी है। में अभी इतना बेजान नहीं हुआ हूँ । मे इतनी आखानी से सल्तनत को हाथ से न जाने दूँगा, अपने को इतने सस्ते दामों ग्रेरों के हाथों न बेचंगा, मुल्क की इजज्ञत को न मिटने दूँ गा; चाहे इस कोशिश में मेरी जान ही क्याँन जाय । कुछ और नहीं कर सकता, अपनी जान तो दे ही सकता हूँ। मेरी बेड़ियाँ खोल दो ।
कप्तान--में आपका खादिम हूँ, सगर मुझे यह मजाज नहीं ।
राजा- -( जोश मे आकर ) ज़ालिम, यह इन बार्तों का वक्त नहीं । एक-एक पल हमे तबाही की तरफ लिए जा रहा है। खोल दे ये बेड़ियाँ। जिस घर से आग लगो है, उसके आदमी खुदा को नही याद करते, कुएँ की तरफ दोढ़ते हैं ।
राज्य भक्त द्ध
कप्तान--आप मेरे मुहसिन हैं। आपके हुक्म से सु ह नहों' भोड सकता । लेकिन--
राजा--जल्दो करो, जल्दो करो। अपनो तलवार मुझ दे दो । अब इन तकल्लुफ की बातों की मोका नही है ।
कप्तान साहब निरुत्तर हों गए । सजीव उत्साह में बड़ी संक्रामक शक्ति होती है । यद्यपि राजा साहब के नोति-पूर्ण वार्तालाप ने उन्हे माक्तूल नही किया, तथापि वह अनिवाय रूप से उनकी बेडियॉ खोलने पर तत्पर हो गए । उसो वक्त, जेल के दारोगा को बुलाकर कहा--साहब ने हुक्म दिया है कि राजा साहब को फौरन आजाद कर दिया जाय । इसमें एक पल की भी ताख्नोर ( विलंब ) हुई, तो तुम्हारे हक्क मे अच्छा न होगा ।
दारोग़ा को मालूम था; कप्तान साहब और मि०.. . मे गाढ़ी मेत्री है। अगर . ..साहब नाराज़ हो जायँंगे, तो रोशनुद्दीला की कोई सिफारिश मेरी रक्षा न कर सकेगी । उसने राजा साहब की बेड़ियाँ खोल दी ।
राजा साहब जब तलवार हाथ मे लेकर जेल से निकले, तो उनका हृदय राज्य-भक्ति की तरंगों से आंदोलित हो(रहा था | उसी वक्त, घडियाल ने ११ बजाए |
(३)
आधी रात का समय था। सगर लखनऊ की तंग गलियों में
सब चहल-पहल थी। ऐसा मालूम होता था, अभी सिफ
७० प्रेम-पंचमी & बज होंगे । सराफे में सबसे ज्यादा रौनक थी। मगर शाश्चय यह था कि किसी दूकान पर जवाहरात या गहने नहीं दिखाई देते थे। केवल आददमियों के आने-जाने की भीड़ थी । जिसे देखो, पाँचो शस्त्रों से सुसज्जित, मू्रें खड़ी किए, ऐंठ्ता हुआ चला जाता है । बाजार के मामूली दूकानदार भी निश्शख् नेथे। सहसा एक आदमी, भारी साफा बाँधे, पैर को घ् टनियों तक नीची कबा पहने, कमर में पटका बाँधे, आकर एक सराफ की दूकान पर खड़ा हो गया। जान पड़ता था, कोई इंरानो सौदागर है । उन दिनो ईरान के व्यापारी लखनऊ मे बहुत आते-जाते थे। इस समय ऐसे किसी आदमी का आ जाना असाधारण बात न थी । , सराफ का नास साधोदास था। वोला--“कहिए सीर साहब, कुछ दिखाऊँ १” _ सौदागर--सोने का कया निखे है ? ४ & माधो--( सौदागर के कान के पास मुँह ले जाकर ) निख को की कुछ न पूछिए । आज करीब एक महदोने से बाज़ार का निखे बिगड़ा हुआ है। माल बाज़ार में आता हो नहीं। लोग दवाएं हुए हैं ; बाजारों मे ख्नौफ के मारे नही लाते। अगर आपको ज्यादा माल द्रकार हो; तो मेरे साथ ग़रीबखाने तक तकलोफ कीजिए । जैसा माल चाहिए, लीजिए । निखे मुनासित्र ही होगा | इसका इतमीनान रखिए ।
राज्य-्सक्त ७१
सौदागर--आजकल बाज़ार का निख क्यों बिगड़ा हुआ है ?
माधो-कक््या आप हाल ही में वारिद हुए हैं १-*
सौदागर-हाँ, मे आज ही आया हूँ । कहीं पहले की-सी रौनक नहीं नजर आती | कपड़े का बाज़ार भी सुस्त है । ढाके का एक कीमती थान बहुत तलाश करने पर भी नहीं मिला ।
माधो--इसके बड़े किस्से हैं ; कुछ ऐसा ही सुआमला है।
सोदागर--डाकुओं का जोर तो नही है ? पहले तो यहाँ इस किस्म की वारदाते नही होती थी ।
साधो--अब वह कैफियत नही है | दिन-दहाड़े डाके पड़ते हैं। उन्हें कोतवाल क्या; बादशाह सलामत भी गिरफ्तार नहीं कर सकते । अब ओर क्या कहूँ | दीवार के भी कान होते है। कही कोई सुन ले, तो लेने के देने पड जायें ।
सोदागर--सेठजी, आप तो पहेलियाँ बुकवाने लगे। में परदेसी आदमी हूँ; यहाँ किपसे कहने जाऊँगा। आखिर बात क्या है ? बाजार क्यो इतना बिगढा हुआ है ? नाज की मंडी की तरफ गया; तो वहाँ भी सन्नाटा छाया हुआ था। मोटी जिस भी दूने दामो पर बिक रही थी ।
साधो--( इधर-उधर चौकन्नी श्रौँखों से देखकर ) एक महीना हुआ; रोशनुद्दोला के हाथ मे सियाह-सफेद करने का अख्तियार आ गया है। यह सब उन्ही को बदइंतजामी का फल है | उनके पहले राजा बख्तावरसिह हमारे मालिक थे। उनके वक्त मे किसी की सजाल न थी कि व्यापारियों को टेढ़ी आँख से देख
७२ प्रम-पंचमी
सकता | उनका रोब सभी पर छाया हुआ था । फिरंगियों पर डनको कड़ी निगाह रहतो । हुक्म था कि कोई फिरंगी बाज़ार में आवे, तो थांने का सिपाही उसकी देख-भाल करता रहे । इसो वजह से फिरंगी उनसे जला करते थे। आखिर सबने रोशनुद्दोल्ला को मिलाकर बख्तावरसिंह को बेकुसूर केद करा दिया । बस, तब से बाजार में लूट मची हुई है। सरकारी अमले अलग लूटते हैं; फिरंगी अलग नोचते-खसोटते हैं । जो चीज चाहते हैं, उठा ले जाते हैं। दाम माँगो, तो धमकियाँ देते हैं । शाही दरबार में फरियाद करो, तो उलटे सजा होतो है । अभी हाल ही मे हम सब मिलकर बादशाह सलामत की खिद- मत में हाजिर हुए थे । पहले तो वह बहुत नाराजु हुए, पर आखिर रहम आ गया । बादशाहों का मिजाज ही तो है । हमारी सब्र शिकायते सुनीं, ओर तसकोन दी कि हम तहकीक्लात करेंगे। मगर अप्ती तक तो वही लूट-खसोट जारी है ।
इतने में तोन आदमी राजपूतो ढंग को मिझ्ञेद् पहने आकर दूकान के सामने खड़े हो गए | साधोदास उनका रंग-ढंग देख- “कर चोका । शाही फोज के सिपाही बहुधा इसो सज-धज से निकलते थे | तीनो आदमी भी सौदागर को देखकर ठिठके ; पर उसने उन्हे कुछ ऐसी निगाहों से देखा कि तीनो आगे चले गए । तब सौदागर ने माधोदास से पूछा--इन्हें देखकर तुम क्यों चोके १”
माधोदास ने कह्ा--ये फोज के सिपाही हैं। जब से
राज्य-भमक्त दे
राजा बख्तावरसिंह नजर-बंद् हुए हैं, इन पर किसी की दाब ही नहीं रही । खुले साँड़ की तरह बाजारों में चक्कर लगाया करते हैं। सरकार से तलब मिलने का कुछ ठीक तो है नही। बस, नोच-खसोट करके गुजुर करते हैं |--हाँ, तो फिर अगर मरजी हो; तो मेरे साथ घर तक चलिए, आपको माल दिखाऊँ ।
सोदागर--नही भई, इस वक्त, नही; सुबह आऊँगा। देर हो गई है; ओर भुमे भी यहाँ की हालत देखकर खोफ मालूम होने लगा है ।
यह कहकर सोदागर उसी तरफ चला गया, जिधर वे तीनो राजपूत गए थे। थोड़ी देर मे ओर तीन आदमी सराफे मे आए | एक तो पंडितों की तरह नीची चपकन पहले हुए था ; सिर पर गोल पगिया थी; और कंधे पर जरो के काम का शा । उसके दोनो साथी ख्रिद्मतगारों के-से कपड़े पहने हुए थे | तीनो इस तरह इधर-उधर ताक रहे थे, मानो किसी को खोज रहे हों। यों ताकते हुए तीनों आगे चले गए।
ईरानी सोदागर तीत्र नेत्रों से इधर-उधर देखता हुआ एक : मील चला गया । वहाँ एक छोटा-सा बाग था। एक पुरानी मस्जिद भी थी। सोदागर वहाँ ठहर गया । एकाएक तीनो राज- पूत मस्जिद से बाहर निकल आए, और बोले--हुजूर तो बहुत देर तक सराफ की दूकान पर बेठे रहे । क्या बातें हुईं ९
सोदागर ने अभी कुछ जवाब न दिया था कि पीछे से पंडित
्७छ प्रेम-पंचसी
ओर उनके दोनो खिद्मतगार भो आ पहुँचे । सौदागर ने पंडित को देखते ही भत्सना-पूर्ण शब्दों में कहा--मियाँ रोशनुद्दो्ा, मुझे इस वक्त तुम्हारे ऊपर इतना गुस्सा आ रहा है कि तुम्हें कुत्तों से लुचवा दूँ । नमकहराम कहीं का ! दगाबाज ! ! तूने मेरी सल्तनत को तबाह कर दिया ! सारा शहर तेरे जुल्म का रोना रो रहा है | मुझे आज मालूम हुआ कि तूने क्यों राजा बख्ता- वरसिह को केद कराया । मेरी अकक््ल पर न-जाने क्यों पत्थर 'पड़ गए थे कि मे तेरी चिकनी-उपड़ी बातों मे आ गया। इस नमकहरामी की तुझे वह सजा दूँगा कि देखनेवालों को भी इबरत ( शिक्षा ) हो ।
रोशनुद्दोला ने निर्मीकृता से उत्तर दिया-आप मेरे बादशाह हैं, इसलिये आपका अदब करता हूँ, वर्ना इसी वक्त, 'इस बदज़बानी का मजा चखा देता | खुद आप तो महल से हसीनों के साथ ऐश किया करते हैं, दूसरो को कया ग़रज़ पड़ी है कि सल्तनत को किक्र से दुबले हों | खूब, हम अपना खून जलावें, और आप जशन मनावें। ऐसे अहमक कही और रहते होंगे ।
बादशाह--( क्रोध से कॉएते हुए ) सि० . ... में तुम्हे हुक्म देता हूँ कि इस नमकहराम को अभी गोली मार दो । मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता । और, इसी वक्त जाकर[इसकी सारी जाय- दाद जब्त कर लो | इसके खानदान का एक बच्चा भी जिंदा न रहने पावे ।
राज्य-सक्त ज्र
रोशन--मि० ... .- में तुम्हे हुक्म देता हूँ कि इस सुल्क और क्नोम के दुश्मन, रेयत-कातिल और बदकार आदमी को फोरन् गिरफ्तार कर लो | यह इस काबिल नहीं कि ताज और तख्त का मालिक बने |
इतना सुनते ही पाँचो अँगरेज सुसाहबों न, जो भेष बदले हुए साथ थे, बादशाह के दोनो हाथ पकड़ लिए, ओर खीचते हुए गोमती की तरफ ले चले । बादशाह की आँखे खुल गई । समम गए कि पहले हो से यह षड्यंत्र रवा गया था। इधर- उधर देखा; कोई आदमी नहीं । शोर मचाना ज्यर्थ था । वाद- शाही का नशा उतर गया | दुरवस्था वह परीक्षाग्नि है, जो मुलम्मे ओर रोगन को उत्तारकर भनुष्य का यथार्थ रूप दिखा देती है । ऐसे ही अवसरों पर विद्त होता है कि मानव-हृद्य पर क्त्रिस सावों का कितना गहरा रंग चढ़ा होता है। एक क्षण में बाद- शाह को उद्दंडता ओर घमंड ने दीनता और विनण्शीलता का आश्रय लिया । बोले-मैने तो आप लोगों को मरजी के खिलाफ ऐसा कोड काम नही किया, जिसकी यह सजा मिले । मेने आप लोगों को हमेशा अपना दोस्त समभा है ।
रोशन--तों हम लोग जो कुछ कर रहे हैं, बह भी आपके फायदे के लिये ही कर रहे हैं। हम आपके सिर से सल्तनत का वीक उतारकर आपको आजाद कर देंगे । तब आपके ऐश में खलल न पड़ेगा । आप बेफिक्र होकर हसीनों के साथ ज़्िदगी के मज़े लूटिए्गा |
७ प्रेम-पंचमी
बादशाह--तो क्या आप लोग मुमो तख्त से उतारना चाहते हैं ?
रोशन--नहीं, आपका बादशाही की जिम्मेदारियों से आजाद कर देना चाहते हैं ।
बादशाह--हज़रत इमाम की कसम) में यह ज़िल्लत न बदाश्त करू गा । मैं अपने बुजुर्गों का नाम न डवाऊँगा ।
रोशन--आपके बुजुर्गों के नाम की फ्रिक्र हमे आपसे ज्यादा है। आपको ऐशपरस्ती बुजुर्गों का नाम रोशन नही कर रही है ।
वादशाह--( दीनता से ) में वायदा करता हूँ कि आइंदा से मैं आप लोगों को शिकायत का कोई मौका न दूँगा ।
रोशन-नशेबाजो के वायदों पर कोई दीवाना ही यक्तीन ला सकता है ।
बादशाह--तुम मुझे तख्त से ज़बरदरती नही उत्तार सकते ।
रोशन--इन धमकियों की जरूरत नहीं। चुपचाप चले चल्निए $ आगे आपको सेज-गाड़ी मिल्ष जायगी । हम आपको इज्जत के साथ रुखसत करेंगे।
बादशाह--आप जानते हैं, रियाया पर इसका क्या असर होगा ९
रोशन--खब जानता हूँ ! आपकी हिमायत में एक डे गली भी न उठेगी | कल सारी सल्तनत में घी के चिराग जलेगे।
इतनी देर मे सब्र लोग उस स्थान पर आ पहुँचे, जहाँ बाद-
राज्य-सक्त ७७
शाह को ले जाने के लिये सवारी तैयार खडी थी | लगभग २४ सशझ्र गारे सिपाही भो खड़े थ। बादशाह सेज-गाड़ी को देखकर सचल गए । उनके रुधिर की गति तीत्र हो गई | भोग ओर विलास के नीचे दबो हुईं मर्यादा सजग हो गई। उन्होने जीर से कटका देकर अपना हाथ छुडा लिया, ओर नैराश्य- पूर्ण दुस्साहस के साथ, परिणाम-मय को त्यागकर, उच्च स्वर से बोले--ऐ लखनऊ के बपनेवालो ! तुम्हारा बादशाह यहाँ दुश्मनो के हाथो क॒सल किया जा रहा है । उसे इनके हाथ से बचाओ, दोड़ो, वनों पछताओगे ! यह आत-पुकार आकाश की नीरवता को चीरती हुई गोमती को लहरो में विज्नीन नहों हुईं, बल्कि लखनऊवालों के ह्ृदयों में ज्ञा पहुँची । राजा बख्तावरसिह बंदी-गृह से निकलकर नगर-निवासियो का उत्तेज्ञत करते, और प्रतिक्षण रक्षाकारियों के दल को बढ़ाते बड़े बेग से) दौड़े चले आ रहे थे | एक पत्र का विलंब भो षड़यत्रकारियों के घातक विरोध को सफल कर सकता था । देखते-देखते उनके साथ दो-तीन दज़ार सशख्र मनुष्यों का दल हो गया था। यह सामूहिक शक्ति बादशाह ओर लखनऊ-राज्य का उद्धार कर सकती थो । समय सब कुछ था । बादशाह गोरो सेना के पंजे में फँस गए, तो फिर समस्त लखनऊ भी उन्हें मुक्त न कर सकता था। राजा साहब ज्यों- ज्यो आगे बढ़ते जाते थे, नेराश्य से दिल बैठा जाता था। विफल-मनोरथ होने की शंका से उत्साह भग हुआ जाता
छ्प प्रेम-पंचमी
था । अब तक कहीं उन लोगों का पता नहीं ! अवश्य हम देर में पहुँचे । विद्रोहिियों ने अपना काम पूरा कर लिया। लखनऊ-राज्य की स्वाधीनता सदा के लिये विसर्जित हो गई !
ये लोग निराश होकर लोटना ही चाहते थे कि अचानक बादशाह का आतनाद सुनाई दिया था। कई हजार कंठों से आकाशपेदी ध्वनि निकली-हुजूर को खदा सलामत रक््खे, हम फिदा होने को आ पहुँचे !
समस्त दल एक ही प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर, वेगवतो जलघारा की भाँति, घटना-स्थल की ओर दौडा | अशक्त लोग भी सशक्त हो गए। पिछडे हुए लोग आगे निकल जाना चाहते थे। आगे के लोग चाहते थे कि उड़कर जा पहुँचे।
इन आदमियों की आहट पाते ही गोरो ने बंदुके भरी, ओर २४ बंदूकों की बाढ़ सर हो गई । रक्षाकारियों में से कितने ही लोग गिर पड़े ; मगर क़दम पीछे न हटे । वीर-सद ने ओर भी मतवाला कर दिया । एक क्षण मे दूसरो वाढ़ आई ; कुछ लोग फिर वीर-गति को प्राप्त हुए । लेकिन कदम आगे हो बढ़ते गए। तीसरी बाढ़ छूटनेवाली ही थी कि लोगो ने विद्रोहियो को जा लिया । गोरे भांगे ।
लोग बादशाह के पास पहुँचे । अदूसुत दृश्य था। बादशाह रोशनुहोला की छाती पर सवार थे | जब गोरे जान लेकर भागे, तो बादशाह ने इस नर पिशाच को पकड़ लिया था; और उसे बल-पूवेक भूमि पर गिराकर उसकी छाती पर बैठ गए थ।
राज्य-भक्त ७६
अगर उनके हाथ मे हथियार होता, तो इस वक्त, रोशन की लाश फडकती हुई दिखाई देती |
राजा बख्तावरसिह आगे बढ़कर बादशाह को आदाब बजा लाए । लोगों को जय-ध्वनि से आकाश हिल उठा । कोई बाद- शाह के पैरों को चूमता, कोई उन्हे जाशीर्वाद देता ।
रोशलुद्दोला का शरीर तो ल्छल्ज्रोर-धूर्ना का लक्ष्य बना हुआ था । कुछ बिगड़े-दिल ऐसे भी थे; जो उसके सह पर थूकते भी संकोच न करते थे ।
(४)
प्रातःकाल था । लखनऊ मे आन॑दोत्सव सनाया जा रहा था। बादशाही सहल के सामने लाखों आदमी जमा थे। सब लोग बादशाह को यथायोग्य नजर देने आए थ। जगह-जगह गरीबों को भोजन कराया जा रहा था । शाही नोबतखाने में नोबत मड़ रही थी । ॥
दरबार सजा । बादशाह हीरे ओर जवाहर से जगमगाते, रत्न-जटित आभूषणो से सजे हुए सिहासन पर आ विराजे। रइसों ओर अमीरों ने नज़रे गुज्ञारी। शायरो ने कुसीदे पढ़े । एकाएक बादशाह ने पूछा--राजा बख्तावरसिह कहाँ हैं ? कप्ताद ने जवाब दिया--केदखाने मे ।
बादशाह से उसी वक्त, कई कर्मचारियों को भेजा कि राजा साहब को जेलखाने से इज्जत के साथ लावें । जब थोड़ी देर के बाद राजा ने आकर बादशाह को सलाम किया, वह तख्त
८० है प्रेम-पंचमी से उतरकर उनसे गले मिले, और उन्हे अपनी दाहनी ओर सिहासन पर बैठाया। फिर दरबार मे खड़े होकर उनकी सुकोर्नि ओर राज्य-भक्ति की प्रशंसा करने के उपरांत अपने ही हार्थों से उन्हें खिलअत पहनाई । राजा साहब के कुटुब के प्राणी भी आदर ओर सम्मान के साथ बिदा किए गए ।
अंत को जब दोपहर के समय द्रबार बरखास्त होने लगा, तो बादशाह ने राजा साहब से कहा--आपने मुझ पर ओर मेरी सल्तनत पर जो एहसान किया है) उसका सिला ( पुरस्कार ) देना मेरे इमकान से बाहर है। सेरी आपसे यही इल्तिजा € अनुरोध ) है कि आप वजारत का क़लमदान अपने हाथ मे ली।जए, और सल्तनत का, जिस तरह मुनासिव सममिए, इंतजाम कोजिए। मै आपके किसी कास में दखल न दूँगा। मुझे एक गांशे मे पड़ा रहने दोजिए। नमकहराम रोशन को भी मै आपके सिपुदं किए देता हूँ। आप जो सजा चाहे, इसे दें। मै इस कब का जहन्नुस भेज चुका होता , पर यह सममकर कि यह आपका शिकार है, इसे छोड़े हुए हूँ ।
लेकिन बख्तावरसिह बादशाह के उच्छूुखल स्वभाव से भलो मॉँति पारचित थे। वह जानते थे, बादशाह की ये स्दि- ज्छाएँ थोड़े हो दिनो को मेहमान हैं। मानव-चरित्र मे आकस्मिक परिवर्तन बहुत कम हुआ करते है । दो-चार महीने मे दरबार का फिर वही रंग हो जायगा । इसलिये सेरा तटस्थ रहना ही
. अच्छा है । राज्य के प्रति मेरा जो कुछ कतेव्य था, वह मैंने पूरा
राज्य-मक्त
करें दिया। मै दरबार से अलग रहकेरअुनष्काशृ:भाँव से जितनो सेव। कर सकता हूं; उत्तनी दरबार से रहकर कदापि नही। दितैषो मित्र का जितना सम्मान होता है, स्वामि-भक्त सेवक का उतना नही हो सकता।
वह विनोत भाव से बोल--हुजूर, मुझे इस ओहदे से भुआफ रकक्खे। मे यो ही आपका खादिस हूँ। इस ससब पर किसी लायक आदमी को मामूर फरमाइए ( नियुक्त कीजिए ) मे अक्खड़ राजपूत हूँ । मुल्की इंतजाम करना क्या जानूँ ।
बादशाह--सुझे तो आपसे ज्यादा लायक ओर वफादार आदमी नज़र नहों आता ।
सगर राजा साहब उनको बातों मे न आए । आखिर मजबूर होकर बादशाह ने उन्हे ज्यादा न दूधाया । दूस-भर बाद जब रोशनुद्देत्ला को सज़ा देने का प्रश्न उठा, तब दोनो आदमियों मे इतना मत-भेद् हुआ कि वाद-विवाद की नोचत आ गई। बाद- शाह आग्रह करते थे कि इसे कुत्तो से नुचवा दिया जाय । राजा साहब इस बात पर अड़े हुए थें कि इसे जांन से न मारा जाय, केवल नज़रबंद कर दिया जाय। आंत सें बादशाह ने क्रुद्ध होकर कहा--यह एक दिन आपको ज़रूर दसा देगा !
राजा--इस खौफ से मे इसकी जान न छूँगा।
बादशाह--तो जनाब, आप चाहे इसे मुआफ कर दें, में कभो मुआफ नहीं कर सकता ।
पर प्रेम-पंचसी
राजा--आपने तो इसे मेरे सिपुर्द कर दिया है। दी हुई चीज़ को आप वापस केसे लेंगे ९
बादशाह ने कहा--तुमने मेरे निकलने का कहीं रास्ता हो नहीं रक्खा ।
रोशनुद्दोला की जान बच गई। वजारत का पद कप्तान साहब को मिला । सगर सबसे विचित्र बात यह थी कि रेजी*' डेंट ने इस षड़यंत्र से पूर्ण अनभिज्ञता प्रकट की, और साफ लिख दिया कि बादशाह सलामत अपने अँगरेज मुसाहवां को चाहे जो सजा दे; मुझे कोई आपत्ति न होगी। में उन्हे पाता, तो स्वयं बादशाह की ख्रिद्मत में भेंज देता, लेकिन पाँचो महानुभावों मे से एक का भी पता न चला | शायद् वे सब-के-पघब रातो- रात कलकत्ते भाग गए थे। इतिहास में उक्त घटना का कही उल्लेख नहीं किया गया; लेकिन किवदंतियाँ, जो इतिहास से अधिक विश्वसनीय हैं, उसकी सत्यता की साक्षी हैं।
अधिकार-चिंता (१)
टठामी यों देखने में तो बहुत तगड़ा था । भूँकता, तो सुनने- (वालों के कार्नों के परदे फट जाते। डील-डौल भी ऐसा कि अँधेरी रात मे उस पर गये का भ्रम हो जाता । लेकिन उसकी श्वानांचित बोरता कसी संग्राम-क्षेत्र मे प्रमाणित न होतो थी । दो-चार दफ जब बाज़ार के लेंडियों ने उसे चुनौती दी, तो वह उनका गव-मर्दन करने के लिये मैदान में आया । देखनेवालों का कहना है कि वह जब तक लड़ा, जोवट से लड़ा; नर्खा ओर दाँता से ज्याद्य चांटे उसको दुम ने की । निश्चित रूप से नही कहा जा सकता कि मैदान “किसके हाथ रहता, कितु जव उस दल्ल को कुमक मँगानो पड़ी, तो रण-शास्त्र के नियर्मों के अनुसार विजय का श्रेय टामो को हो देता उचित न्याया- नुकूल जांच पड़ता है । टामी ने उस अवसर पर कौशल, से काम लिया ओर दाँत निकाल दिए, जो संधि की याचना थी । किंतु तब से उसने ऐसे सन्नोति-विहीन प्रतिहृंद्वियोँ के मुह लगना उचित न सममका ।
इतना शांति-प्रिय होने पर भो टामी के शन्रुओं की संख्या दिनोदिन बढ़ती जाती थी । उसके बराबरवाले तो उससे इस- लिये जलते कि बह इतना मोटा ताजा होकर इतना भीरु क्यों न
८ प्रेस-पं चसी
है। बाज़ारी दल इसलिये जलता कि टामी के मारे घूरों पर की हड़ियाँ भी न बचने पाती थी | वह घड़ी रात रहे उठता, ओर हलवाइयों की दूकानों के सामने के दाने ओर पत्तल, कसाईखाने के सामने की हडियाँ ओर छीछड़े चबा डालता । अतएव इतने शत्रुओं के बीच मे रहकर टामी का जोवन संकट- मय होता जाता था । महीनों बीत जाते, ओर पेट भर भोजन/« न मिलता । दो-तीन बार उसे मन-माने भोजन करने की ऐसी प्रबल उत्कंठा हुई कि उसने संदिग्ध साधनों द्वारा उसे पूर्ण करने को चेष्टा को; पर जब परिणाम आशा के ग्रतिकूत्त हुआ ओर स्वादिष्ट पदार्थों के बदले अरुचिकर, दुर्शाह्य वस्तुएँ भर- पेट खाने को मिली--जिससे पेंट के बदले कई दिन तक पीठ से विषम वेदना होती रहो--तो उसने विवश होकर फिर सन्मार्ग का आश्रय लिया" पर डंडो से पेट चाहे भर गया हो, बह उत्कंठा शांत न हुई | वह किसो ऐसी जगह जाना चाहता था, जहाँ खूब शिकार मिले; खरगोश, हिरन, भेड़ो के बच्चे मैदानो में विचर रहे हा, ओर उनका काइ मालिक न हो; जहाँ किसी प्रतिद् द्वी की गंध तक न हो; आराम करने को सघन बृत्षों की छाया हो, पोने को नदी का पवित्र जल | वहाँ मन-माना शिकार करूँ; खाऊँ, और मीठो नीद साऊं। वहाँ चारो ओर मेरी धाक बैठ जाय ; सब पर ऐसा रोब छा जाय कि मुझको हो अपना राजा समभने लगें, और धीरे-धोरे मेरा ऐसा सिक्का बैठ जाय कि किसी 6 षी को वहाँ पेर रखने का साहस ही न हा ।
आअधिकार-चिता पर
संयोग-वश एक दिन वह इन्हीं कल्पनाओं के सुख-स्वप्त देखता हुआ, सिर कुकाए; सडक छोड़कर गलियों से चला जा रहा था कि सहसा एक सज्जन से उसकी मुठभेड़ हो गई। टठामी ले चाहा कि बचकर निकल जाऊँ; पर वह दुष्ट इतना शांति-प्रिय न था | उसने तुरंत कपटकर टामी का टेहुआ पकड़ लिया । टामी ने बहुत अचुनय-विनय की ; गिड़गिढाकर कहा-- इश्वर के लिये मुझे यहाँ से चले जाने दो ; कसम ले लो, जो इंधर पैर रक््खूँ। मेरी शामत आई थी कि तुम्हारे अधिकार- क्षेत्र से चला आया | पर उस मदांध और निदय प्राणी ने जरा भी रियायत न की। अंत मे हारकर टासी ने गदभ-स्वर में फरियाद करनी शुरू की | यह कोलाहल सुनकर मोहल्ले के दो-चार नेता लोग एकत्र हो गए ; पर उन्होंने भो दीन पर दया करने के बदले उल्नटे उसी पर दुंत-प्रहार करना शुरू किया । इस अन्याय-पूर्ण व्यवहार ने टामी का दिल तोड़ दिया। वह जान छोड़कर भागा । उन अत्याचारी पशुओं ने बहुत दूर तक उसका पीछा किया ; यहाँ तक कि साग से एक नदो पड़ गई। टासी ने उसमें कूदकर अपनी जान बचाई । कहते हैं, एक दिन सबके दिन फिरते हैं । ढासी के दिन भी नदी से कूदते दी फिर गए। कूदा था जान बचाने के लिये, हाथ लग गए मोती । तैरता हुआ उस पार पहुँचा, तो वहाँ उसकी चिर-सचित अभिलाषाएँ मृतिसती हो रही थीं ।
पद प्रेम पंचमी (२)
एक विस्व॒त मैदान था । जहाँ तक निगाह जाती, हरियाली की छटा दिखाई देती । कहीं नालों का मधुर कलरव था; कहीं मरनों का मंद गान; कहीं वृक्षों के सुखद पंज, कही रेत के सपाट मैदान । बड़ा सुरम्य, मनोहर दृश्य था |
यहाँ बड़े तेज़ नखोबाले पशु थे, जिनको सूरत देखकर टामी का कलेजा दृहल उठता । उन्होंने टामी की कुछ परवा न की । वे आपस में नित्य लड़ा करते ; नित्य खून को नदी बहा करती थो। टामी ने देखा, यहाँ इन मयंकर ज॑तुओं से पेश न पा सकेँगा । उसने कौशल से काम लेना शुरू किया। जब दो लड़नेचाले पशुओं मे एक घायल और सुददां होकर गिर पड़ता; तो टामी लपककर मांस का कोई ड्ुकड़ा ले भागता ओर एकांत में बेठकर खाता | विजयी पशु विजय के उन्माद् में उसे तुच्छ समककर कछ न बोलता !
अब क्या था, ठामी के पौ-बारद हो गए। सदा दिवाली रहने लगी । न गड़ की कमी थी, न गेहूँ की । नित नए पदार्थ उड़ाता और वृक्षों के नीचे आनंद से सोता | उसने ऐसे सुख स्वग की कल्पना भी न की थी | वह मरकर नही, जीते-जो स्वग पा गया।
थोड़े ही दिनों मे पौष्टिक पदार्थों के सेवन से ठामी की चेष्ट ही कछ और दो गई । उसका शरीर तेजस्वी और सुसंगठित दो गया। अब वह छोटे-मोटे जीवों पर स्वय हाथ साफ करने लगा । जंगल के जंतु तब चौके, और उसे वहाँ से भगा देने का
अधिकार-चित्ता पं
यह्न करने लगे । टामी ने एक नई चाल चलो । वह कभी किसी पशु से कहता, तुम्हारा फ़र्लाँ शत्रु तुम्हें मार डालने की तेयारी कर रहा है; किसी से कद्दता, फलाँ तुमको गाली देता था | जंगत् के जंतु उसके चकमे में आकर आपस में लड़ जाते, और टासी को चाँदो हो जाती। अंत मे यहाँ तक नोबत पहुँची कि बड़े-बड़े * जंतुओं का नाश हो गया। छोटे-छोटे पशुओं को उससे मुकाबला करने का साहस न होता । उसकी उन्नति ओर शक्ति देखकर उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगा; मानो यह् विचित्र जीव आकाश से हमारे ऊपर शासन करने के लिये भेजा गया है। टामी भी अब अपनी शिरफारबाजी के जौहर दिखाकर उनको इस आंति को घुष्ट किया करता | वह बड़े गवे से कहता--परमात्मा ने मुम्े तुम्दारे ऊपर राज्य करने के लिये भेजा है। यह इश्वर की इच्छा है। तुम आराम से अपने घरों मे पड़े रहो, में तुमसे कुछ न बोलूगा। केवल तुम्हारी सेवा करने के पुरस्कार-स्वरूप तुममें से एक-आध का शिकार कर लिया करूँगा। आख़िर मेरे भी ता पेट है; विना आहार के कैसे जोवित रहूँगा, और केसे तुम्हारो रक्षा करूँगा ? वह अब बड़ी शान से ज॑गल मे चारों ओर गौरबान्वित दृष्टि से ताकता हुआ विचरा करता। टामी को अब कोई चिता थी, तो यह कि इस देश मे मेरा कोई मुददरई न उठ खड़ा हो । बह निस्य सजग और सशख्र रहने लगा | ज्यों-ज्यों दिन गुजरते थे, और उसके सुख-भोग का चसका बढ़ता जाता था, त्यों-त्यो उसकी चिता भी बढ़ती जातो थी ।
ठ्ज़ प्रेम-पंचमी
वह अब बहुधा रात को चोक पड़ता, और किसी अज्ञात शतन्र के पीछे दौड़ता । अक्सर “अधा ककुर बतासे मूँके'*बाली लोकोक्ति को चरितार्थ करता; वन के पशुओं से कहता-- इश्वर न करे कि तुम किसी दूसरे शासक के पंजे में फेस जाओ । वह तुम्हें पीस डालेगा। में तम्हारा हितैषी हूँ; सदेव तुम्हारी शुभ कासना में सग्न रहता हूँ | किसी दूसरे से यह « आशा मत रक्खो। पशु एक ही स्वर से कहते--जब तक हम जिएँगे, आप ही के अधीन रहेंगे !
आखिरकार यह हुआ कि टामी को क्षण-भर भी शांति से बैठना दुलभ हो गया । वह राव-रात और दिन-विन-भर नदी फे
“किनारे इधर-से-उधर चकर लगाया करता । दोड़ते-दौड़ते हाँफने
लगता, बेदस हो जाता; मगर चित्त को शांति न मिलती । कहीं कोई शत्रु न घुस आए ।
लेकिन कार का सहीना आय तो ठटामी का चित्त एक बार फिर अपने पुराने सहचरों से मिलने के लिये लालायित होने लगा । वह अपने सन को किसी भाँति रोक न सका | उसे वह दिन याद आया; जब वह दो-चार मित्रों के साथ किसी प्रेमिका के पीछे गली-गलो और कूचे-कूचे में चक्कर लगाता था। दी- चार दिन उसने सत्र किया। पर अत में आवेग इतना प्रबल हुआ कि वह तकदीर ठोककर खड़ा हो गया। उसे अब अपने तेज और बल पर अमिमाव भी था। दो-चार को तो वह अकेले मजा चखा सकता था ।
अधिकार-चिता -+
कितु नदो के इस पार आते ही उसका आत्मविश्वास प्रात- काल के तम के समान फटने लगा । उसकी चाल संद् पड़ गई, सिर आप-ही-आप ऊ्रुक गया, दुम सिक्ुड़ गई। सगर एक प्रेमिका को आते देखकर वह ॒ विह्नल हो उठा ; उसके पोछे हो लिया । प्रेमिका को उसकी वह कुचेष्टा अग्रिय लगी । उसने तीत्र स्वर से उसकी अवहेलना की । उसकी आवाज़ सुनते ही उसके कई प्रेमी आ पहुँचे, ओर टामी को वहाँ देखते ही जामे से बाहर हो गए । टामी सिटपिटा गया। अभी निश्चय न कर सका था कि क्या करूँ कि चारो ओर से उस पर दातों ओर नर्खों को वर्षा होने लगी। भागते भी न बन पड़ा । देह लहू- लुहान हो गई । भागा भी; तो शैतानों का एक दल पीछे था।
उस दिन से उसके दिल मे शंका-सी समा गई। हर घड़ी यह भय लगा रहता कि आक्रमणकारियों का दल मेरे सुख ओर शांति मे बाधा डालने के लिये, मेरे स्वग को विध्व॑स करने के लिये; आ रहा है । यह शंका पहले भी कम न थी ; अब - ओर भी बढ़ गई।
एक दिन उसका चित्त भय से इतना व्याकुल हुआ कि उसे जान पड़ा, शत्रु-दल आ पहुँचा | वह बड़े वेग से नदी के किनारे आया, ओर इधर-से-उघर दोड़ने लगा ।
दिन बीत गया, रात बीत गई ; पर उसने विश्राम न लिया ।
दूसरा दिन आया ओर गया ; पर टामी निराहार-निजल; नदो के किनारे, चक्कर लगाता रहा ।
&० प्रेम-पंचमी
इस तरह पाँच दिन बीत गए । टामी के पैर लड़खड़ाने लगे, श्राँखों-तले अं घेरा छाने लगा । छ्लुधा से व्याकुल होकर गिर- गिर पड़ता, पर वह शंका किसी भाँति शांत न होती ।
अ'त में सातवें दिन अभागा ठामी अधिकार-चिता से अस्तः जजर और शिथिल होकर परलोक सिधारा । वन का कोई पशु उसके निकट न गया । किसी ने उसकी चर्चा तक न को ; किसी ने उसकी लाश पर आँसू तक न वहाए। कई दिनों तक उस पर गिद्ध ओर कोए मैंडराते रहे; अ'त में अस्थि-पंजरों के सिवा ओर कुछ न रह गया।
गृह-दाह (१)
सत्यप्रकाश के जन्मोत्सव मे लाला देवप्रकाश ने बहुत रुपए खर्चे किए थे । उसका विद्यारंभ-संस्कार भी खूब धूम-धाम से किया गया । उसके हवा खाने को एक छोटो-सी गाड़ी थी। शाम को नोकर उसे टहलाने ले जाता। एक नौकर उसे पाठ- शाला पहुँचाने जाता, द्नि-भर वही बैठा रहंता और उसे साथ लेकर घर आता था। कितना सुशील, होनहार बालक था ! गोरा मुखड़ा, बड़ी-बड़ी आँखे, ऊँचा सस्तक, पतल्े-पतले लाल अधर, भरे हुए हाथ-पाँव | उसे देखकर सहसा मुँह से निकल पड़ता था--भगवान् इसे जिला दे, प्रतापी मनुष्य होगा । उसकी बाल-बुद्धि की प्रघर्ता पर लोगों को आश्चय होता था। नित्य उसके मुख-चंद्र पर हँसी खेलती रहती थी। किसी ने उसे हठ करते या रोते नहीं देखा ।
वर्षा के दिन थे। देवप्रकाश बहन को लेकर गंगा-स्नान करने गए। नदी खूब चढ़ी हुई थो, मानों अनाथ को आँखे हों। उसको पत्नी निमत्ञा जल में बैठकर क्रीड़ा करने लगी। कभी आगे जातो, कभी पीछे जाती, कभी डबकी सारती, कभी अ'जु- लियो से छीटे उड़ाती । देवप्रकाश ने कहा--अच्छा, अब
ध्र् प्रेम-पंचमी
निकलो, नहीं ती सरदी हो जायगी । निर्मला ने कहा-कहो, तो में छाती तक पानी में चली जाऊँ ?
देवप्रकाश--ओऔर, जो कही पैर फिसल जाय !
निर्मला-पैर क्या फिसलेगा !
यह कहकर वह छातो तक पानी में चली गई। पति ने कहा--अच्छा, अब आगे पेर न रखना | कितु नि्ंत्रा के सिर पर मौत खेल रहो थी। यह जल-क्रीड़ा नहीं--सृत्यु-क्रीड़ा थी । उसने एक पग ओर आगे बढ़ाया और फिसल गई । मुह से एक चीख निकली; दोनो हाथ सहारे के लिये ऊपर उठे ओर फिर जल-मग्न हो गए। एक पल मे प्यासी नदी उसे पी गई । देवप्रकाश खड़े तौलिए से देह पोछ रहे थे । तुरंत पानी मे कूदे, साथ का कहार भी कूदा । दो मल्लाह भी कूद पड़े । सब ने डबकियाँ मारी; टठोला ; पर निर्मला का पता न चला । तब डोंगी मेंगवाई गई। मल्लाहों ने बार-बार ग्रोते सारे; पर लाश हाथ न आई | देवप्रकाश शोक में डूबे हुए घर आए। सत्यग्रकाश किसी उपहार की आशा मे दोड़ा | पिता ने गोद में उठा लिया; और बड़े यत्न करने पर भी अपनी सिसकी न रोक सके । सत्यप्रकाश ने पूछा--अम्मा कहाँ हैं ९
देव०--बेटा, गंगा ने उन्हें नेवता खाने के लिये रोक लिया ।
सध्यप्रकाश ने उनके मुख की ओर जिज्ञासा-भाव से देखा ओर आशय समम गया । “अम्मा, अम्सा!ः कहकर रोने लगा ४
ग्रह-दाह धरे
(२)
सातृहीन बालक संसार का सबसे करुणाजनक प्रांणी है । दीन-से-दोन प्राणियों को भी इश्वर का आधार होता है, जो उनके हृदय को सँभालता रहता है । माठहोन बालक इस आधार से भो वंचित होता है। माता ही उसके जीवन का एक-मात्र आधार होती है| माता के विना वह पंख-हीन पक्षी है ।
सत्यप्रकाश को एकांत से प्रेम हो गया। अकेले बैठा रहता । वृक्षों मे उसे उस सहालुभूति का कुछ-कुछ अज्ञात अनुभव होता था, जो घर के प्राणियों में उसे न मिलतो थी। माता का प्रेम था तो सभी प्रम करते थे ; माता का प्रेम उठ गया, तो सभी निष्ठुर हो गए। पिता की आँखों मे भी वह प्रेम-ज्योति न रही। दरिद्र को कौन भिक्षा देता है ?
छः मद्दीने बीत गए | सहसा एक दिन उसे मालूम हुआ, मेरी नई माता आनेवालो है। दोड़ा पिता के पास गया ओर पूछा--क्या मेरी नई साता आबेगी ? पिता ने कहा--हाँ, बेटा, वह आकर तुम्ह प्यार करेंगी ।
सत्य+--क्या सेरी सा र्र्ग से आ जायैंगी ?
देव८--हाँ) वही आ जायेगी ।
सत्य०--मुर्मे उसी तरह प्यार करेंगी ९
देवप्रकाश इसका क्या उत्तर देते ? मगर सत्यप्रकाश उस दिन से पग्रसन्न-मन रहने लगा । अम्मा आवेगी ! मुझे गोद मे लेकर प्यार करेगो ! अब में उन्हे कभी दिक न
ध्हे प्रेस-पंचमी करूँगा, कभी ज़िद् न करूँगा, अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाया करूँगा ।
विवाह के दिन आए । घर से तैयारियाँ होने लगीं । सत्य- प्रकाश खुशी से फूला न समाता | मेरी नई अम्मा आवेगी । बरात मे वह भी गया। नए-तए कपड़े मिले। पालको पर बैठा | नानी ने अंदर घुलाया, और उसे गोद में लेकर एक अशरफी दी । वहीं उसे नई माता के दशन हुए। नानी ने नई माता से कहा--बेटी, कैसा सुदर बालक है! इसे प्यार करना ।
सत्यप्रकाश ने नई माता को देखा और मुग्ध हो गया । बच्चे भो रूप के उपासक होते हैं । एक लावण्यमयी मूर्ति आभूषणों से लदी सामने खड़ी थी । उसने दोना हाथों से उसका अचत्त पकड़कर कहा--अम्सा !
कितना अरुचिकर शब्द था, कितना लज्ञायुक्तः कितना अप्रिय ! वह ललना, जो 'देवश्रिया' नाम से संबोधित होती थी, उत्तरदायित्व, त्याग और क्षमा का संबोधन न सह सकी । अभी वह प्रेम ओर विलास का सुख-स्वप्त देख रही थी--योवन- काल की मदमय वायु-तरंगों में आंदोलित हो रही थी। इस शब्द ने उसके स्वप्न को भंग कर दिया । कुछ रुष्ट होकर बोली-मुमे अम्मा मत कहो |
सत्यप्रकाश ने विस्मित नेत्रों से देखा । उसका बाल-रसवप्न भंग हो गया । आँखें डबडबा गई । नानी ने कहा--बेटी,
ग्रहन्दाह ६२
देखो, लड़के का दिल छोटा हो गया। वह क्या जाने, क्या कहना चाहिए। अम्मा कह दिया; तो तुम्हें कोन-सी चोट लग गई ९
देवप्रिया ने कहा--मुझे अम्मा न कहे ।
(३)
सौत का पुत्र विमाता की आँखों मे क्यों इतना खटकता है, इसका निर्णय आज तक किसी मनोभाव के पंडित ने नहीं किया । हम किस गिनती मे हैं । देवप्रिया जब तक गर्भिणी न हुई, वह सत्यप्रकाश से कभो-कभी बाते करती, कहानियाँ सुनाती ; कितु गर्भिणी होते ही उसका व्यवहार कठोर हो गया । प्रसव-काल ज्यों-ज्यों निकट आता था, उसकी कठोरता बढ़ती ही जाती थी। जिस दिन उसकी गोद में एक चाँद-से बच्चे का आगमन हुआ, सत्यप्रकाश ख्ब उछला-कूदा और सौर-ग्रह में दोड़ा हुआ बच्चे को देखने गया | बच्चा देवश्रिया की गोद में सो रहा था। सत्यप्रकाश ने बड़ो उत्सुकता से बच्चे को विमाता को गोद से उठाना चाहा कि सहसा देवश्रिया ने सरोष स्वर में कहा--खबरदार; इसे मत छूना; नहीं तो कान पकड़कर उखाड़ लूँगी।
बालक उलटे पाँव लोट आया और कोठे की छत पर जाकर खब रोया | कितना सदर बच्चा है! में उसे गोद में लेकर बैठता; तो केसा मज़ा आता ! में उसे गिराता थोड़े ही, फिर इन्होंने म॒के मिड़क क्यों दिया ? भोला बालक क्या जानता
६द् प्रेम-पंचमी था कि इस मिड़की का कारण माता की सावधानी नही कुछ ओर है ।
शिशु का नाम ज्ञानप्रकाश रक्खा गया था । एक दिन बह सो 'रहा था। देवश्रिया स्तानागार में थी। सत्यप्रकाश चुपके से आया; ओर बच्चे का ओंढ़्ना हटाकर उसे अनुरागमय नेत्रों से देखने लगा । उसका जी कितना चाह्य कि उसे गोद मे लेकर प्यार करूँ; पर डर के मारे उसने उसे उठाया नही, केवल उसके कपोलों को चूमने लगा । इतने मे देवपश्रिया निकल आईं । सत्यप्रकाश को बच्चे को चूमते देखकर आग हो गई । दूर हो से डाँट--हट जा वहाँ से !
सत्यप्रकाश दीन नेत्रों से माता को देखता हुआ बाहर निकल आया ।
सध्या-समय उसके पिता ने पूछा-तुम लक्ला को क्यों 'रुलाया करते हो ९
सत्य०--में तो उसे कभी नहीं रुलाता । अम्मा खेलाने को 'नही देती ।
देव०--भूठ बोलते हो, आज तुसने बच्चे को चुटकी काटी।
सत्य०--जी नहीं, में तो उसकी मुच्छियाँ ले रहा था ।
देव०--भूठ बोलता है !
सत्य०--में कूठ नही बालता ।
देवप्रकाश का क्रोधष आ गया । लड़के को दो-तीन तमाचे लगाए । पहली बार यह ताइना मिली, ओर निपराध ! इसने उसके जीवन की काया-पत्ञट कर दी ।
गृह-दाह् ६७
(४)
डस दिन से सत्यप्रकाश के स्वभाव में एक विचित्र परिवतन दिखाई देने लगा | वह घर मे बहुत कम आता ; पिता आते, तो उनसे सुँह छिपाता फिरता | कोई खाना खाने को बुलाने आता, तो चोरों की भाँति दबकता हुआ जाकर खा लेता; न कुछ माँगता, न कुछ बोलता । पहले अत्यंत कुशाम्रबुद्धि था। उसको सफाई, सल्लीके ओर फुरती पर लोग मुग्ध हो जाते थे। अब वह पढ़ने से जी चुरात मैले-कुचैले कपड़े पहने शहता । घर मे कोई प्रेम करनेवाला न था ! बाजार के लड़कों के साथ गल्ली-गली घूमता। कनकोवे लूटता | गालियाँ बकना भी सीख गया । शरीर दुबंल हो गया । चेहरे की कांति ग़ायब हो गई । देवप्रकाश को अब आए दिन उसकी शरारतों के उल्हने मिलने लगे; और सत्यप्रकाश नित्य घुड़कियाँ और तमाचे खाने लगा, यहाँ तक कि अगर वह कभी घर में किसी कास से चला जाता, तो सब लोग दूर-दूर कहकर दोड़ते |
ज्ञानप्रकाश को पढ़ाने के लिये मास्टर आता था । देवप्रकाश उसे रोज़ सेर कराने साथ ले जाते | हँसमुख लड़का था । देव- प्रिया उसे सत्यप्रकाश के साए से भो बचाती रहतो थो । दोनो लड़को मे कितना अतर था ! एक साफ-सुथरा, सुद्र कपड़े पहने, शील ओर विनय का पुतला, सच बोलनेवाला ; देखने- वालों के सुँह से अनायास ही ढुआ निकल आती थी। दूसरा मैला, नटखठ, चोरों की तरह मुँह छिपाए हुए, सुँहफटं, बोत*
ध्ष प्रेम-पंचमी
बात पर गालियोँ बकनेवाला । एक हरा-भरा पौधा, प्रेम मे झावित, स्नेह से सिचित; दूसरा सूखा हुआ, टेढ़ा, पन्नवह्दीत नववृक्ष, जिसकी जड़ो को एक मुद्दत से पानो नही नसीब हुआ। एक को देखकर पिता की छाती ठंडी द्वोती; दूसरे को देखकर देह मे आग लग जाती ।
आश्वय यह था कि सत्यप्रकाश को अपने छोटे भाई से लेश-मात्र भी ईर्ष्या न थी। अगर उसके हृदय में कोई कोमल भाव शेप रह गया था, तो वह ज्ञानग्रकाश के प्रति स्नेह था । उस मरुभूसि में यही एक द्रियाली थो । इईंष्या साम्य-्भाव की चोतक है । सत्यप्रकाश अपने भाई को अपने से कही ऊंचा, कही भाग्यशाली सममभता | उसमे इष्या का भाव ही लोप हो गया था ।
घृणा से घृणा उत्पन्न होती है; प्रेम से प्रेम । ज्ञानप्रकाश भी बढ़े भाई को चाहता था। कभी-कभो उसका पक्ष लेकर अपनी सा से वाद-विवाद कर बैठता । कहता--सैया की अचकन फट गई है, आप नई अधचकन क्यों नहीं बनवा देती ? मा उत्तर देती--उसके लिये वही अचकन अच्छी है | अभी क्या, अ्रभी तो वह नंगा फिरेगा। ज्ञानप्रकाश बहुत चाहता था कि अपने जेब-खच से बचाकर कुछ अपने भाई को दे, पर सत्य- प्रकाश कभी इसे स्वीकार न करता । वास्तव में जितनी देर वह छोटे भाई के साथ रहता; उतनी देर उसे एक शांतिमय आनंद का अनुभव होता । थोड़ी देर के लिये बह सद्ूभाषों के
ग्रृह-दाह ध्६
साम्राज्य मे विचरने लगता । उसके मुख से कोई भद्दो ओर अग्निय बात न निकलती । एक क्षण के लिये उसकी सोई हुई आत्मा जाग उठतो |
एक बार कई दि्नि तक सत्यप्रकाश मद्रसे न गया। पिता ने पूछा--तुम आजकल पढ़ने क्यो नहीं जाते ? क्या सोच रक््खा है कि मेने तुम्हारी जिद्गी-सर का ठेका ले रखा है ?
सत्य०-मेरे ऊपर जुर्माने और फीस के कई रुपए हो गए हैं। जाता हूँ, तो दरजे से निकाल दिया जाता हूँ।
देव०--फीस क्यो बाकी है ? तृम्र तो महीने-महीने ले लिया करते हो न ?
सत्य०--आए दिन चंदे लगा करते हैं | फीस के रुपए चंदे में दे दिए।
देव०--और जुर्माना क्यो हुआ ९
सत्य०--फीस न देने के कारण ।
देव०--तुमने चंदा क्यो दिया ?
सत्य०--ज्ञानू ने चंदा दिया; तो मेंने भी दिया ।
देव०--तुम ज्ञानू से जलते हो ९
सत्य०--मैं ज्ञान से क्यो जलने लगा। यहाँ हम और वह दो हैं, बाहर हम और वह एक समझे जाते हैं। भें यह नहीं कहना चाहता कि मेरे पास कुछ नही है ।
देव०--कक््यों, यह कहते शम आती है ९
सत्य०--जी हाँ, आपकी बदनासी होगी ।
१०० प्रेम-पंचमी
देव०--अच्छा, तो आप मेरी मान-रक्षा करते हैं ! यह क्यों नही कहते कि पढ़ता अब मंजर नही । मेरे पास इतना रुपया नहीं कि तुम्हे एक-एक क्लास में तीन-तीन साल पढ़ाऊँ; ऊपर से तम्हारे खच के लिये भी प्रतिमास कुछ दूँ । ज्ञान बाबू तुमसे कितना छोटा है, लेकिन तुमसे एक ही दफा नीचे है। ठुम इस साल ज़रूर ही फेल होआंगे; वह ज़रूर ही पास होगा । अगले साल तुम्हारे साथ हो जायगा। तब तो तुम्हारे मुँह मे कालिख लगेगो न ।
सत्य०--विद्या मेरे भाग्य द्वी मे नही है ।
देव०--तुम्हारे भाग्य मे क्या है ?
सत्य०--भीख माँगने ।
देव०--तो फिर भीख द्वी माँगो | मेरे घर से निकल जाओ |
देवप्रिय॒ भी आ गई । बोज़ी--शरमाता तो नहीं, और बातों का जवाब देता है ।
सत्य०--जिनके भाग्य मे भोख मसाँगना होता है) वे ही बच- पन में अनाथ हो जाते हैं ।
देवप्रिया--ये जली-कटो बाते अब सुझसे न सही जायेंगी । में खून का घूँट पी-पीकर रह जातो हूँ ।
देवप्रकाश--बेहया है । कल से इसका नाम कटवा दूँगा । भीख माँगनी है; तो भीख ही माँगो ।
(४) दूसरे दिन सत्यप्रकाश ने घर से निकलने की तैयारी कर दी
गृह-दाह १०१
उसकी उम्र अब १८ साल की हो गई थी। इतनी बाते सुनने के बाद उसे उस घर मे रहना असह्य हो मया था। जब तक हाथ- पाँव न थे, किशोरावस्था की असमथता थी, तब तक अवहेलना, निरादर, निठ्ुरता, भत्सेना सब कुछ सहकर घर मे रहता रहा । अब हाथ-पाँव हो गए थे, उस बंधन मे क्यों रहता ! आत्मा- भिमान, आशा की भाँति, चिरजीबी होता है।
गर्मी के दिन थे । दोपहर का समय | घर के सब प्राणी सो रहे थें। सत्यप्रकाश ने अपनी धोतोी बग्रल में दबाई, एक छोटा- सा बैग हाथ में लिया ओर चाहता था कि चुपके से बैठक से निकल जाय कि ज्ञानू आ गया, और उसे जाने को तैयार देखकर बोला--कहाँ जाते होः भैया ९
सत्य०--ज्ञाता हूँ, कही नोकरी करूँगा । _
ज्ञान०--मैं जाकर अम्सा से कहे देता हूँ।
सत्य०--तो फिर सें तुमसे भी छिपाकर चला जाऊँगा।
ज्ञान०--क्यों चले जाओगे ? तुम्हें मेरी ज़रा भी मुहब्बत नही ९
सत्यप्रकाश ने भाई को गले लगाकर कहा--तुम्दे छोड़कर जाने को जो तो नही चाहता, लेकिन जहाँ कोई पूछनेवाला नहीं है, वहाँ पड़े रहना बेहयाई है। कही दस-पाँच की नौकरो कर लूँगा, और पेट पालता रहूँगा ; और किस लायक हूँ ९
ज्ञान०--तुमसे अस्मा क्यो इतना चिद्ती हैं ? मुझे तुमसे मिलने को सना किया करती हैं।
१०२ प्रेम-पंचमी
सत्य०-मेरे नस्तीब खोटे हैं, और क्या ।
ज्ञान०--तुम लिखने-पढने मे जो नहीं लगाते ?
सत्य०--लगता ही नही, कैसे लगाऊँ ? जब कोई परवा नहीं करता, तो में भी सोचता हूँ--ऊँह, यही न होगा, ठोकर खाऊँगा। बला से !
ज्ञान०--मुमे भूल तो न जाशओगे ? में तुम्हारे पास खत लिखा करूँगा । मुझे भी एक वार अपने यहाँ घुलाना ।
सत्य०--तुम्हारे स्कूल के पते से चिट्ठी लिख गा ।
ज्ञान०--( रोते-रोते ) मुझे न-जाने क्यों तुम्हारी बड़ी महब्बत लगती है ।
सत्य०--मै तुम्हे सदैव याद रक्खूँगा।
यह कहकर उसने फिर भाई को गले से लगाया, ओर घर से निकल पड़ा । पास एक कौड़ी भी न थी, ओर वह कलकत्तें जा रहा था ।
(६)
सत्यम्रकाश कलकत्ते क्योंकर पहुँचा; इसका वृत्तांत लिखना उ्यथ है। युवकों मे दुस्साहस को मात्रा अधिक होती है । वे हवा मे क्लिले बना सकते हैं--धरती पर नाव चला सकते हैं। कठिनाइयों को उन्हें कुछ परवा नहीं होती । अपने ऊपर असीम विश्वास होता है । कल्कत्ते पहुँचना ऐसा कष्ट-साध्य न था। सत्यप्रकाश चतुर युवक था। पहले ही उसने निश्चय कर लिया था कि कलकचे में क्या करूँगा, कहाँ रहूँगा। उसके बैग में
ग्ह-दाह १०३
'लिखने की सामग्री मोजूद थो। बड़े शहरों मे जोविका का प्श्न कठिन भो है, और सरल भो । सरल है उनके लिये, जो हाथ से काम कर सकते हैं; कठिन है उनके लिये, जो क़त्षम से काम करते है। सत्यप्रकाश मजदूरी करना नीच समझता था । उसने एक धसंशाला मे असबाब रक््खा | बाद में शहर के मुख्य- मुख्य स्थानों का निरीक्षण कर एक डाकघर के सामने लिखने का सामान लेकर बैठ गया, और अपद मजदूरों की चिट्ठियाँ, मनीआऑडर आदि लिखने का व्यवसाय करने लगा । पहले कई दिन तो उसको इतने पैसे भी न मिले कि भरपेट भोजन करता, लेकिन धीरे-धीरे आमदनी बढने लगी । वह मजुदूरों से इतने बिनय के साथ बाते करता ओर उनके समाचार इतने विस्तार से लिखता कि बस, वे पत्र को सुनकर बहुत प्रसन्न होते । अशिक्षित लोग एक ही बात को दो-दो, तीन-तीन बार लिखते हैं । उनकी दशा ठीक रोगियों की-सी होती है, जो वैद्य से अपनी व्यथा और बेदना का वृत्तांत कहते नहीं थकते। सस्य- प्रकाश सूत्र को व्याख्या का रूप देकर मजदूरों को मुग्ध कर देता था। एक संतुष्ट होकर जाता , तो अपने कई अन्य भाइयों को खोज लाता । एक ही महीने मे उसे १) रोज मिलने लगा । उसने धर्मशाला से निकलकर शहर से बाहर ४) महीने पर एक छोटी- सी कोठरी ले ली । एक जून बनाता, दोनो जून खाता । बन अपने हाथों से धोता | जुमीन पर सोता । उसे अपने निर्वासन पर जरा भी खेद ओर दुःख न था । घर के लोगों की कभी
१०४ प्रेम-पंचमी
याद न आती। वह अपनी दशा पर संतुष्ट था। केवल ज्ञान- प्रकाश की ग्रेम-युक्त बातें! न भूलतीं । अंधकार मे यही एक प्रकाश था। बिदाई का अंतिम दृश्य श्राँखों के सामने फिर करता | जीविका से निश्चित होकर उसने ज्ञानप्रकाश को एक पत्र लिखा । उत्तर आया । उसक आनंद की सीमा न रही |; ज्ञानू मुझे याद करके रोता है, मेरे पास आना चाहता हैं स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं है। प्यासे को पानी से जो तृप्ति होती. है, वद्दी तृप्ति इस पत्र से सत्यप्रकाश को हुई | मै अकेला नहीं हूँ, कोई मुमे भी चाहता है--मुझे भी याद करता है ! उस दिन से सत्यप्रकाश को यह चिता हुई कि ज्ञानू के लिये
कोई उपहार भेजूँ । युवकों को मित्र बहुत जल्द मिल जाते हैं। सत्यप्रकाश की भी कइ्टे युवकों से मित्रता हो गई थी।
उनके साथ कई वार सिनेमा देखने गया | कई बार बूटी-मभंगः
शराब-क़वाब की भी ठहरी। आइना, तेल कंधी का शोक़ भी पैदा हुआ । जो कुछ पांता; उड़ा देता ; बड़े वेग से नेतिक पतन ओर शारीरिक विनाश की ओर दौड़ा चला जाता था।इस प्रेम-पत्र ने उसके पैर पकड़ लिए। उपहार के प्रयास ने इन
दुव्येसनों को तिरोहित करना शुरू किया। सिनेमा का चसका
छूटा । मित्रों को हीले-हवाले करके टालने लगा। भोजन भी
रूखा-सूखा करने लगा। घन-संचय को चिता ने सारी इच्छाओं
को परास्त कर दिया। उसने निश्चय किया कि एक अच्छी-सी घड़ी
भेजूँ । उसका दाम कस-से-कम ४०) होगा । अगर तीन महीने
गृहन्दाह १०४
तक एक कोड़ी का भी अपव्यय न करूँ, तो घड़ी मिल सकती है। ज्ञानू घपड़ो देखकर कैसा खुश होगा | अम्मा ओर बाबूजी भी देखेंगे । उन्हे मालूम हो जायगा कि में भूखों नही मर रहा हैँ। किफायत की धुन मे वह बहुधा दिया-बत्ती सी न करता। बढ़े सबेरे काम करने चत्ञा जाता और सारे दिन दो-चार पैसे की मिठाई खाकर कास करता रहता । उसके ग्राहकों की संख्या द्नि-दूनी होती जाती थी। चिट्ठी-पत्नी के अतिरिक्त अब उससे तार लिखने का भी अभ्यास कर लिया था। दो ही महीतों में उसके पास ४०) एकत्र हो गए; ओर जब घड़ी के साथ सुनहरी चेन का पारसल बनाकर ज्ञानू के नाम भेज दिया; तो उसका चित्त इतना उत्साहित था, मानो किसी निस्संतान के बालक. हुआ हो । (७) ह
“घर! कितनी ही कोमल, पविन्न, मनोहर स्मृतियों को जाग्रत कर देता है ! यह प्रेम का निवास-स्थान है। प्रेम ने बहुत तपस्या करके यह बरदान पाया है ।
किशोरावस्था में 'घर” माता-पिता; भाई-बहन, सखी-सहेली के प्रेस की याद दिलाता है; ्रौढ़ावस्था में गृहिणो और बाल- बच्चों के प्रेम की। यहो वह लहर है, जो मानव-जीवन-सात्र' को स्थिर रखती है, उसे समुद्र को बेगवती लहरों मे बहने और चट्टानों से टकराने से बचाती है। यही वह मंडप है, जो जीवन को समस्त विध्न-बाधाओ से सुरक्तित रखता है ।
१०६ प्रेम-पंचमी
सत्यप्रकाश का 'घरः कहाँ था ? वह कौन-सी शक्ति थी, जो कलककत्ते के विराट् प्रलोभनों से उसकी रक्षा करती थी (-- माता का प्रेस, पिया का स्नेह, बाल-बच्चों की।चिता ?--नहीं, उसका रक्षक, उद्धारक, उसका परितोषक केवल ज्ञानप्रकाश का स्नेह था। उसी के निमित्त वह एक-एक पैसे की किफायत करता | उसी के लिये बह कठिन परिश्रम करता--धनोपाजन के नए-नए उपाय सोचता | उसे ज्ञानप्रकाश के पत्रों से मालूम हुआ था कि इन दिनों देव “काश को आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं । वह एक घर बनवा रहे हैं, जिसमे व्यय अनुमान से अधिक हो जाने के कारण ऋण लेना पड़ा है; इसलिये अब ज्ञानप्रकाश का पढ़ाने के लिये घर पर मास्टर नहीं आंता। तब से सत्यप्रकाश प्रतिसास ज्ञानू के पास कुछ-न-कुछ अवश्य भेज देता था | वह अब केवल पत्र-लेखक न था, लिखने के सामान को एक छोटी-सी दूकान भी उसने खोल ली थी । इससे अच्छी आमदनी हो जाती थी । इस तरह पाँच वष बीत गए। रसिक मित्रों ने जब देखा कि अब यह हत्थे नही चढता, तो उसके पास आना-जाना छोड़ दिया ।
(८)
संध्या का समय था । देवप्रकाश अपने सकान में बठे देव- प्रेया से ज्ञानप्रकाश के विवाह के संबंध में बातें कर रहे थे। ज्ञान अब १७ वर्ष का सुद्रयुवक था। बाल-विवाह के विरोधी होने पर भी देवप्रकाश अब इस शुभ-मुहूत्ते को न टाल सकते
ग्रह-दाह १०७
के; विशेषतः जब कोई महाशय ४,०००) दायज देने को अस्तुत हों ।
देवप्रकाश--मैं तो तैयार हूँ, लेकिन तुम्हारा लड़का भो तो तैयार हो ।
देवप्रिया-तुम बातचोत पक्की कर लो, वह तेयार हो ही जायगा। सभी लड़के पहले “नही” करते हैं ।
देवप्रकाश- ज्ञानू का इनकार केवल संकोच का इनकार नहीं है, वह सिद्धांत का इनकार है । वह साफ़-साफ कह रहा है कि जब तक मैया का विवाह न होगा, मे अपना विवाह करने पर राजी नही हूँ ।
देवप्रिया--उसकी कौन चलाए, वहाँ कोई रखैल रख ली होगी, विवाह क्यों करेगा ? वहाँ कोई देखने जाता है ?
देवप्रकाश--( भुँकलाकर ) रखैल रख ली होती, तो तुम्हारे जड़के को ४०) महीने न भेजता, ओर न वे चीजे ही देता, जिन्हे पहले महीने से अब तक बरावर देता चल्ला आता है । न-जाने क्यों तुम्हारा मन उसको ओर से इतना मैला हो गया है ' चाहे वह जान निकालकर भी दे दे, लेकिन तुम न पसीजोगो ।
देवप्रिया नाराज़ होकर चल्नी गई। देवप्रकाश उससे यही कहलाया चाहते थे कि पहले सत्यप्रकाश का विवाह करना उचित है; किंतु वह कभी इस प्रसंग को आने ही न देती थी। स्वयं देवप्रकाश की यह हार्दिक इच्छा थी कि पहले बड़े क्लड़के का विवाह कर, पर उन्होंने भी आज तक सत्यप्रकाश
श्ण्प प्रेम-पंचमी
को कोई पत्र न लिखा था। देवप्रिया के चले जाने के बाद उन्होने आज पहलो बार सत्यप्रकाश को पत्र लिखा । पहले इतले दिनों तक चुपचाप रहने के लिये क्षमा माँगी। तब उसे एक बार घर आने का प्रेमाश्रह किया । लिखा, अब में कुछ हो दिनों का मेहमान हूँ। मेरो अभिलाषा है, तुम्हारा और तुम्हारे छोटे भाई का विवाह देख लेँ । मुर्के बहुत दुःख होगा। यदि तुम यह विनय स्वोकार न करोगे । ज्ञानप्रकाश के अस- मंजस को बात भी लिखी | अंत मे इस बात पर जोर दिया कि किसी और विचार से नहीं, तो ज्ञानू के प्रेम के नाते ही तुम्हें इस बंधन में पड़ना होगा । सत्यप्रकाश को यह पत्र मिला, तो उसे बहुत खेद हुआ | भेरे आठरस्नेह का यह परिणाम होगा, सुझे न मालूम था| इसके साथ ही उसे यह इंष्यामय आनंद हुआ कि अस्मा और दादा को अब तो कुछ सानसिक पीड़ा होगी । मेरी उन्हें क्या चिता थी? में मर भी जाऊँ। तो भी उनकी आँखों मे आँसू न आवे। ७ वर्ष हो गए; कभी भूलकर भी पत्र न लिखा कि मरा है; या जीता है। अब कुछ चेतावनी सिलेगो । ज्ञानप्रकाश अंत मे विवाह
करने पर राजी तो हो ही जायगा, लेकिन सहज मे नहीं। कुछ न हो, तो मुझे तो एक बार अपने इनकार के कारण लिखने का
अवसर मिला । ज्ञानू को सुमसे प्रेम है, लेकिन उसके कारण में पारिवारिक अन्याय का दोषी न बनेगा । हसारा पारिवारिक जीवन संपूर्णतः अन्यायमय है । यह कुमति ओर वेसनत्य; करता:
गूह-दाह १०६
और नृशंसता का बोजारोपण करता है। इसो साया मे फैंसकर मनुष्य अपनी प्यारों संतान का शत्रु हो जाता है। ना, में आँखों देखकर यह सकखी न निगलूँगा। में ज्ञानू को समभा ऊँगा अवश्य । मेरे पास जो कुड जमा है, वह सब उसके विवाह के निमित्त अर्प॑ण भो कर दूँगा। बस, इससे ज्यादा में ओर कुछ नहीं कर सकता । अगर ज्ञानू भी अविवाहित हो रहे, तो संधार कौन सूना हो जायगा ? ऐसे पिता का पुत्र क्या वंशपरंपरा का पालन न करेगा ? क्या उसके जोवन से फिर वही अभिनय न दुहराया जायगा, जिसने मेरा सर्वबनाश कर दिया ?
दूसरे दिन सत्यप्रकाश ने ४००) पिता के पास भेजे; ओर पत्र का उत्तर लिखा कि मेरा अहोसाग्य, जो आपने मुझे याद् किया । ज्ञानू का विवाह निश्चित हो गया, इसकी बघाई ! इन रुपयो से सवबधू के लिये कोई आभूषण बनवा दीजिएगा। रही मेरे विवाह की बात । सो मेने अपनी आँखों से जो छुछ देखा और मेरे सिर पर जो क॒छ बोती है; उस पर ध्यान देते हुए यदि में कुदुब-पाश से फेसूं, ता मुझसे बड़ा उल्लू संसार मे न होगा। आशा है, आप सुमे क्षमा करेंगे । विवाह की चर्चा हो से मेरे हृदय को आधात पहुँचता है ।
दूसरा पत्र ज्ञानप्रकाश को लिखा कि माता-पिता को आज्ञा को शिरोधाये करो। मैं अपड, मूखे, बुद्धि-द्नीन आदसी हूँ; मुझे; विचाह करने का कोई अधिकार नहीं है। खेद है, मैं तुम्हारे विवाह के शुभोत्सव से सम्मिलित न हो सकूँगा। लेकिन
११० प्रेम-पंचमी
मेरे लिये इससे बढ़कर आनंद और संतोष का विषय नहीं ही सकता । (६)
देवप्रकाश यह पढकर अबाक् रह गए। फिर आग्रह करने का साहस न हुआ। देवप्रिया ने ताक सिकोडुकर कहां-- यह लोडा देखन हो को सोधा है, है जहर का बकाया हुआ ! सो कोस पर बैठा हुआ वरहियों से कैसा छेद रहा है ।
कितु ज्ञानप्रकाश ने यह पत्र पढा, तो उसे सर्माघात पहुँचा । दादा और अस्मा के अन्याय ने ही उन्हें यह भीषण त्रत धारण करने पर वाध्य किया है। इन्ही से उन्हे निर्बासित किया है, और शायद सदा के लिये। न-जाने अम्मा को उनसे क्यों इतनी जलन हुई । मुझे तो अब याद आता है कि किशोरावस्था ही से वह बड़े आज्ञाकारी, विनयशील ओर गंभीर थे । उन्हें अम्मा की बातों का जवाब देते नही सुना | में अच्छे-से-अच्छा खाता था; फिर भो उनके तेवर मैले न हुए हालाँकि उन्हें जलना चाहिए था। ऐसी दशा मे अगर उन्हें गाह्स्थ्य जीवन से घुणा हो गई, तो आश्चये हो कया ९ फिर में क्यों इस विपत्ति में फँसूँ? कौन जाने, मुझे भी ऐसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़े । भैया ने बहुत सोच-सममकर यह घारणा को है |
संध्यासमय जब उसके माता-पिता बेठे हुए इसी समस्या पर विचार कर रहे थे, ज्ञानप्रकाश ने आकर कहा-में कल भैया से मिलने जाऊँगा |
गृह-दाह १११
३ कप
देवप्रिया--क्या कलकत्ते जाओगे ?
ज्ञान०--जो हाँ ।
देवप्रिया--5न्ही को क्यों नहीं बुलाते ९
ज्ञान०--उन्हे कोन सुँह लेकर बुलाऊँ ? आप लोगों ने तो पहले ही मेरे मँह मे कालिख लगा दी है ) ऐसा देव-पुरुष आप लोगों के कारण विदेश में ठोकर खा रहा है, ओर में इतना निलज्न हो जाऊँ कि . ...
देवप्रियां--अच्छा चुप रह) नही ब्याह करना है; न कर, जले पर लोन मत छिड़क ! माता-पिता का धर्म है, इसलिये कहती हूँ; नही तो यहाँ ठेंगे को परवा नहीं है । तू चाहे ब्याह कर, चाहे क्वाँरा रह; पर मेरी आँखों से दूर हो जा ।
ज्ञान०--क्या मेरी सूरत से भी घृणा हो गई ९
देवप्रिया--जब तू हमारे कहने ही मे नही; तो जहाँ चाहे रह । हम भरी समर लेंगे कि भगवान् ने लड़का ही नही दिया। . देव०--कयों व्यथ ऐसे कठु वचन बोलती हो १
ज्ञान०--अगर आप लोगों की यही इच्छा है, तो यही होगा | देवप्रकाश ने देखा कि बात का बतंगढ़ हुआ चाहता है; तो ज्ञानप्रकाश को इशारे से टाल दिया, और पत्नी के क्रोध को शांत करने की चेष्ठा करने लगे। सगर देवप्रिया फूट-फूटकर रो रही थी, बार-बार कहती थी--मैं इसकी सूरत न देखगी। आंत मे देवप्रकाश ने चिढ़कर कहा-तो तुम्ही ले तो कट वचन कहकर उसे उत्तेजित कर दिया ।
११२ प्रेम-पंचमी
देवप्रिया--यह सब्र बिष उसी चांडाल न बोया है, जो यहाँ से सात समुद्र-पार बैठा हुआ मुमे मिट्टी मे मिलाने का उपाय कर रहा है। मेरे बेटे को मुझसे छीनने हो क्रे लिये उसने यह प्रेम का स्वाँग भरा है।में उसकी नस नस पहचानती हूँ। उसका यह मंत्र मेरी जान लेकर छोड़ेगा ; नहीं तो मेरा ज्ञानू; जिसने कभी मेरी वात का जवाब नहीं दिया, यों मुझे न जल्लाता।
देव०--अरे, तो क्या वह विवाह ही न करेगा ! अभी गुस्से में अनाप-शनाप बक गया है | जरा शांत हो जायगा, तो भें सममाकर राजी कर दूँगा ।
देवप्रिया--मेरे हाथ से निकल गया |
देवप्रिया की आशंका सत्य निकली | देवग्रकाश ने बेटे को बहुत समझाया । कहा--तुम्हारी माता इस शोक में मर जायगी ; कितु कुछ असर न हुआ । उसने एक बार “नही? कह- कर हाँ न की | निदान वह भी निराश होकर बेठ रहे ।
तीन साल तक प्रतिवष विवाह के दिनों में यह प्रश्न उठता रहा, पर ज्ञानप्रकाश अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहा। माता का रोना-धोना निष्फल् हुआ । हाँ, उसने माता की एक बात मान ली--वह भाई से मिलने कलकत्ते न गया ।
तीन साल में घर मे बड़ा परिवर्तन हो गया। देवप्रिया की तीनो कन््याओं का विवाह हो गया । अब घर से उसके सिवा कोई खी न थी | सूना घर उसे खाए लेता । जब वह नेराश्य और क्रोध से व्याकुल हो जातो, तो सत्यप्रकाश को खूब जी-
ग्ृह-दाह ११३
भरकर कोसती । मगर दोनो भाइयों से प्रेम-पक्न-व्यवहार बरा- बर हांता रहता था ।
ेवग्रकाश के स्वभाव में एक विचित्र उदासीनता प्रकट होने लगी । उन्होंने पंशन ले ली थी; ओर प्राय घर्म-ञ्नथों झा अध्ययन किया करते थे | ज्ञानप्रकाश ने भो 'आचाय? की उपाधि प्राप्त कर ली थी, ओर एक विद्याल्य में अध्यापक हो गए थे ४ देवग्रिया अब संसार मे अफेली थी ।
देवप्रिया अपने पुत्र को गृहस्थी की ओर खीचने के लिये नित्य टोने-टोटके किया करती। बिराद्री से कोन-सली कन्या सुंदर है, गुणव॒तो है, सुशिक्षिता है---उसका बखान किया करतो, पर ज्ञानप्रकाश को इन बातो के सुनने की भी फुरसत न थी ।
मोहल्ले के और घरों मे नित्य ही विवाह होते रहते थे । बहुएँ आती थी; उनकी गोद में बच्चे खेलने लगते थे, घर गुलजार हो जाता था। कही विदाई हांती थी, कही बधाइयाँ आती थी, कही गाला-बजाना होता था; कही बाज़े बजते थे | यह चहल पहल देखकर देवप्रिया का चित्त चंचल हो जाता । उसे मालूम होता, मे ही संसार मे सबसे अभागिनो हूँ। मेरे ही भाग्य में यह सुख भोगना नहीं बदा है। भगवान् ऐसा भो कोई दिन आवेगा कि मै अपनी बहू का सुख चंद्र देखूँगो, बालकों को गोद में खिलाझँगी । वह भी कोइ दिन होगा कि मेरे घर में भो आनंदोत्सव के सधुर गान की ताने उठेगी ! रात-दिन ये ही बातें सोचते-सोचते दृवश्रिया की दशा उन्मादिनी की-सी हो गई ।
११४७ प्रेम-पंचमी
आप-ही-आप सत्यप्रकाश को कोसने लगती--बही मेरे प्राणों का घातक है। तल्लीनता उन्मराढ का प्रधान गुण है । तललीनता अस्यंत रचनाशील होती है। वह आकाश मे देवताओ के विमान उड़ाने लगती है । अगर भोजन में नमक तेज़ हो गया। तो यह शज्नु ने कोई रोड़ा रख दिया होगा। देवप्रिया को अब कभी-कभी धोखा हो जाता कि सत्यप्रकाश घर मे आ गया है, वह सुझे मारना चाहता है, ज्ञानप्रकाश को विष खिलाए देता है । एक दिन उसने सत्यप्रकाश के नाम एक पत्र लिखा; और उसमें जितना कोसते बना, कोसा--तू मेरे प्राणों का वैरी है, मेरे कुल का घातक है, हत्यारा है। वह कौन दिन आवेगा कि तेरी मिट्टी उठेगी। तूने मेरे लड़के पर वशीकरण-संत्र चला दिया है । दूसरे दिन फिर ऐसा ही एक पत्र लिखा, यहाँ तक- कि यह उसका नित्य का कर्स हो गया | जब तक एक चिट्टी मे सत्यग्रकाश को गालियाँ न दे लेती, उसे चैन ही न आता ! इन पत्रो को वह कहारिन के हाथ डाकबर भिजवा दिया करती थी। ( १० )
ज्ञानप्रकाश का अध्यापक होना सत्यप्रकाश के लिये घातक हो गया । परदेश में उसे यही संतोष था कि में संसार मे निरा- धार नहीं हूँ। अब यह अवलंब जाता रहा । ज्ञानप्रकाश ने ज़ोर देकर लिखा--अब आप मेरे हेतु कोई कष्ट न उठावें। मुझे अपनी गुज़र करने के लिये काफी से ज्यादा मिलने लगा है।
यद्यपि सत्यप्रकाश की दूकान खूब चलती थी, लेकिन कल-
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ग्रह-दाह ११५
कत्ते-जेसे शहर में एक छोटे-से दूकानदार का जीवन बहुत सुखी नहीं होता । ६०)-७०) को मासिक आमदनी होती ही क्या है ९ अब तक वह जो कुछ बचाता था; वह वास्तव में बचत न थी, बल्कि ध्याग था| एक वक्त् रूखा-सूखा खाकर एक तंग शआद्रे कोठरी मे रहकर २४)-३०) बच रहते थे। अब दोनो वक्त भोजन मिलने लगा । कपड़े भो ज़रा साफ पहनने लगा। मगर थोड़े ही दिनों मे उसके खच मे औषधियों की एक मद् बढ़ गई | फिर वही पहले की सो दशा हो गई । बरसों तक शुद्ध बायु, प्रकाश आए पुष्टिकर भोजन से वंचित रहकर अच्छे-से-अच्छा स्वास्थ्य भी नए हो सकता है। सत्यप्रकाश को अरूचि, मंदाग्नि आदि रोगो ने आ घरा | कभोन्कभी ज्वर भी आ जाता। युवावस्था में आत्मविश्वास हाता है । किसा अवल्ंब को परवा नही होती। बयोबृद्धि दूसरों का मुँह ताकती है, कोई आश्रय दूढ़तो हे ।
सस्यप्रकाश पहले सोता, ता एक हो करवट मे सवेरा हो जाता । कभी बाज़ार से पूरियाँ लेकर खा लेता; कभी मिठाई पर टाल देता । पर अब रात को अच्छी तरह नींद न आती, बाजारू भोजन से घ॒ुणा होती, रात को घर आता, तो थककर चूर-चूर हो जाता। उस वक्त चूल्हा जलाना, भोजन पकाना बहुत अखरता । कभी-कभी वह अपने अकेलेपन पर रोतां | रांत को जब किसी तरह नीद न आती, तो उसका मन किसी से बाते करने को लालायित होने लगता। पर चहाँ निशांधकार के सिवा और कोन था ? दीवालों के कान चाहे हो, मुँह नही
११६ प्रेम-पंचमी
डोता । इधर ज्ञानप्रकाश के पत्र भी अब कम आते थे; और वे भी रूखे । उनमें अब हृदय के सरत्न उद्गारों का लेश भी न रहता । सत्यप्रकाश अब भो बेसे ही थावसय पत्र लिखता था ; पर एक अध्यापक के लिये भावुकता कब शोभा देती है ? शनेः- शनेः सत्यप्रकाश को भ्रम होने लगा कि ज्ञानप्रकाश भो सुभसे निछुरता करने लगा; नहीं तो कया मरे पास दो-चार दिन के लिये आना असंभव था ? मेर लिये तो घर का द्वार ब॑द है, पर उसे कान-सो बाधा है ? उस ग़रोब को क्या मालूम कि यहाँ ज्ञानप्रकाश ने माता से कलकत्ते न जाने को कसम खा ली है। इस भ्रम ने उसे ओर भी हताश कर दिया ।
शहरों मे मनुष्य बहुत होते हैं, पर मनुष्यता बिरले ही मे होती है । सत्यप्रकाश उस बहु-संख्यक स्थान में भी अकेला था। उसके मन मे अब एक नई आकांक्षा अंकुरित हुईं | क्यों न घर ज्ञांट चलूँ ? किसी संगिनां के प्रेम को क्यों न शरण लूँ? वह सुख आर शांति और कहाँ मिल सकतो है ? मेरे जोबन के निराशांधकार का और कौन ज्योति आलोकित कर सकतों है ? चह इस आवेश को अपनी संपूर्ण विचार-शक्ति से रोकता, पर जिस भाँति किसी बालक को घर में रकखी हुई मिठाइयों की याद बार-बार खेल से घर खींच लाती है, उसी तरह उसका चित्त भी चार-बार उन्हीं सधुर चिंताओं में सग्न हो जाता था | वह सोचता--मुझे विधाता ने सब सुख से वंचित कर दिया है, नहा तो मेरी दशा ऐसी हीन क्यों होती ? मुझे इश्वर ने बुद्धि न दी
गृह-दाह ११७
थी क्या ? कया में श्रम से जी चुराता था ? अगर बालपन ही में मेरे उत्साह और अभिश॒चि पर तुषार न पड़ गया होता, मेरी बुद्धि--शक्तियों का गला न घोट दिया गया होता, तो में भी आज आदमी होता, पेट पालने के लिये इस विदेश मे न पड़ा रहता | नही, में अपने ऊपर यह अत्याचार न करूँगा ।
महीनों तक सत्यप्रकाश के सन और बुद्धि मे यह संघ होता 'रहा। एक दिन वह दूकान से आकर चूल्हा जलाने जा रहा था कि डाकिए ने पुकारा । ज्ञानप्रकाश के सिवा उसके पास और किसी के पत्र न आते थे। आज हो उनका पत्र आ चुका था। यह दूसरा पत्र क्यों ? किसी अनिष्ट को आशंका हुई। पन्न लेकर पढने लगा। एक ज्ञण में पत्र उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ा; और वह सिर थामकर बैठ गया कि जमीन पर न गिर पड़े। यह देवप्रिया को विष- युक्त लेखनो से निकला हुआ जहर का तीर था, जिसने एक पत् मे उसे संज्ञाहोन कर दिया | उसको सारो सम्रातक व्यथा--क्रोघ, नैराश्य, कृनध्नता, ग्लानि--केवल एक ठंडी साँस से समाप्त हो गई।
वह जाकर चारपाई पर लेट रहा | मानसिक व्यथा आप- से-आप पानी हो गई । हा | सारा जीवन नष्ट हो गया! में ज्ञानप्रकाश का शत्रु हूँ ? में इतले दिनों से केवल उसके जोबन को मिट्टी मे मिलाने के लिये ही अमर का स्वाँग भर रहा हूँ? भगवन ! तुम्हीं इसके साक्षी हो !
तीसरे दिन फिर देवप्रिया का पत्र पहुँचा। सत्यप्रकाश ने उसे लेकर फाड़ डाला । पढ़ने की हिम्मत न पड़ी ।
११५ प्रेम-पंचमी
एक ही दिन पीछे तीसरा पत्र पहुँचा । उसका भी वही अंत हुआ । फिर तो यह एक नित्य का कर्म हो गया। पत्र आता ओर फाड़ दिया जाता | किंतु देवग्रिया का अभिप्राय विना पढ़े ही पूरा हो जाता था--सत्यप्रकाश के ममस्थान पर एक चोट आर पड़ जाती थो ।
एक महीने की भीषण हार्दिक वेदना के वाद सत्यप्रकाश को जोदन से घ॒णा हो गई | उसने दूकान बद कर दो, बाहर आना- जाना छोड़ दिया | सारे दिन खाट पर पड़ा रहता । वे दिन याद आते, जव माता पुचकारकर गोद में विठा लेती, ओर कहतो-- वेटा ! पिता संध्या-तमय दफ्तर से आकर गोद मे उठा लेते, ओर कहते--मैया ! साता का सजोब सूर्ति उसके सासने आ खड़ी होती, ठोक वैसी ही जब वह गंगा-स्नान करने गई थी | उसकी प्यार-सरो बातें कार्ता से गूंजने लगती | फिर वह दृश्य सामने आता, जब उसने नववधू माता को “अम्मा! कहकर पुकारा था | तब उसके कठोर शब्द याद आ जाते, उसके क्रोध से भरे हुए विकराल नेत्र आँखो के सामने आ जाते | उसे अपना सिसक्र-सिसककर रोना याद आ जाता | फिर सोरयग्ृह का दृश्य सासने आता । उसने कितने प्रेम से बच्चे को गोद मे लेना चाहा था | तब साता के वज के-से शब्द कानो में गूंजने लगते। हाय ! उसी बज ने मेरा सबनाश कर दिया ! ऐसी कितनी ही घटनाएँ याद आती । कभी विना किसी अपराध के मा को डाट बताना, और कभी पिता का निदंय, निष्ठुर व्यवहार याद आने
गृहनदाह ११६
लगता । उनका वात-बात पर त्योरियाँ वदलना, माता के सिथ्यापवांदों पर विश्वास करना--हाय ! मेरा सारा जीवन नष्ट हो गया ! तव चह करवट वदल लेता, और फिर वही इृश्य आँखों मे किरने लगते | फिर करवट बदलता और चिल्ला उठत्ता--इस जीवन का अंत क्यों नहीं हो जाता !
इस भाँति पडे-पडे उसे कई दिन हो गए | संध्या हो गई थी कि सहसा उसे द्वार पर किसी के पुकारने की आवाज सुनाई पड़ी । उसने कान लगाकर सुना और चौक पडा--कोई परि- चित आवाज थी । दोड़ा, द्वार पर आया, तो देखा, ज्ञानप्रकाश खड़ा है। कितना रूपवान् पुरुष था! वह उसके गले से लिपट गया । ज्ञानप्रकाश ने उसके पैरों को स्पर्श किया । दोनो भाई घर मे आए। अंधकार छाया हुआ था| घर की यह दशा देखकर ज्ञानप्रकाश, जो अब तक अपने कँठ के आवेग को रोके हुए था, रो पड़ा | सत्यप्रकाश ने लालटेन जलाई । घर क्या था, भूत का डेश था। सत्यप्रकाश ने जल्दी से एक कुरता गले मे डाल लिया | ज्ञानप्रकाश भाई का जर्जर शरीर पीला सुख, बुकी हुई आँखे देखता और रोता था ।
सत्यप्रकाश--मै आजकल दीमार हूँ ।
ज्ञानप्रकाश--यह तो देख ही रहा हूँ ।
सत्य०--तुसने अपने आने की सूचला भी न दी, सकान का पता कैसे चला ?
ज्ञान०--सूचना तो दी थी, आपको पत्र न मिला होगा ।
प्रेम पंचमी
सत्य०--अंच्छा, हाँ दी हांगो, पत्र दूकान में पड़ा होगा। में इधर कई दिन से दूकान नहीं गया | घर पर सब कुशल है ९
ज्ञान०-माताजी का देहांत हो गया ।
सत्य०--अरे ! क्या बीमार थी ?
ज्ञान०--जी नही | मालूम नही, कया खा लिया । इधर उन्हें उन््माद-सा हो गया था। पिताजी ने कुछ कट बचन कहे थे, शायद् इसी पर कुछ खा लिया |
सत्य०--पिताजो तो कुशल से हैं ?
ज्ञान०--हाँ, अभी मरे नही हैं ।
सत्य०--अरे ! क्या बहुत बीमार हैं ?
ज्ञान०--माता ने विष खा लिया, दो वह उनका मुँह खोल- कर दवा पिला रहे थे | माताजी ने जोर से उनकी दो डेंगलियाँ काट लीं । वही विष उनके शरीर में पहुँच गया | तब से सारा शरीर सूज आया है । अस्पताल मे पड़े हुए हैं, किसी को देखते है, तो काटने दोड़ते है । बचने की आशा नही है ।
सत्य०--तब तो घर ही चोपट हो गया !
ज्ञान०-ऐसे घर को अब से बहुत पहले चोपट हो जाना'
चाहिए था | 25 ध् ध
[0०
तीसरे दिन दोनो भाई आतः्काल कलकत्ते से बिदा होकर चल दिए !
6 [(७५६
क्थिएययां के पढने योग्य किकिक किफयों की पुस्तक
गंगा-पुस्तकमाक्षा में अनेकों पुस्तक विविध विषयों पर प्रकाशित हुई हैं। हस स्थान पर केवल उन चुनी हुई पुरत्कों के नाम दिए जाते हैं, जिनमें से कुछ स्कूल भौर कुछ फॉलेज की छोटी या बढ़ी कहाओओं में को हैं, और वाक़ी रक्खी जा सकती हैं। आशा है, शिक्षा-संस्थाएँ इन्हें कोर्स में रखकर हमारा उत्साह बढ़ाएँगी।
१, उपन्यास
जुमार तेजा ( सचेत्र )--लेखक, मेहता द्ज्जारास शर्मा ; वीरता- पूर्ण और सत्य घटना-सूलक ।. .. .--.. मूल्य ॥), १) मा ( दो भाग )--लेखक, पं० विश्वंभरनाथ शर्मा 'कौशिक!; कौशिफजी का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास । सूल्य ३), ४) रंगभूमि ( दो भाग )--लेखक, श्रीयुत प्रेमचंदजी ; युगांवरकारी हिंदी का सर्वेश्रेष्ट रजनी तिक उपन्यास | बी० ए० में कोसे। सूल्य ४), ६) सी अजान ओर एक सुजान--लेखक, शरीयुत पं» वालकृष्ण भट्ट ; हिंदी का सबसे पहला अद्वितीय उपन्यास | हिंदी-साहिष्य- सम्मेलन से कोस। हे ; -. भूल्य १), १॥) हृदय की प्यास ( सचित्र )--लेखक, / बँदाचायें प० चतुर-
सेन शास्त्री ; हिंदी में सर्वोत्तम सामाजि” “ , /स | सू््य १७), २) गढ़-कडार--ल्लेखक, बाबू व् दावमः “” वी ए०, एल-एल० बी०; हिंदी का सर्वोत्कष्ट ऐतिहासिक हो. ताज सूक््य २७), ३)
०
अ , केक, अ्रोृप्णानंद गुप्त ; हिंदी का सर्वोत्तम और सबसे
पहला रोम ..... ... .... मूत्य १), १) मृत्युजय--लेखक, श्रीग॒ल्लाबरल्ष वाजपेयी ; स्फूति, साधना भौर देश-भक्ति-पूर्ण मौज्िक उपन्यास । मूह्य ॥)), १0
२. गलप ओर कहानियाँ अद्भुत आलाप---ल्लेखक, ट्विदी-सद्दारथी प० सद्दावोरप्रसादजी द्विवेदी ; अत्यंत रोचक और कौवृहतत-पूर्ण निबंध । सी० पी० में इंट्रेंस में कोर्स । के ,».. मूक्य १), $॥) नाटअकथाउसृत ( सचित्र )--लेखक, प्रिसिपक्ष चंद्रमोक्ति सुकुक एम्० ९०, एल० दी० ; कालिदास, भवभूति, श्रीहर्पदेव-जैसे महा* श्थी संस्कृत-भ्राचायों के नाटकों की १२ फथाएँ ; बिहार में इंट्रेंस में
फोर्स ! डे ««... मूल्य १)), १॥॥) प्रेम-प्रसून--छ्लेखक, श्रीप्रेमचंदजी ; छुनी हुई उत्कृष्ट कहानियों कासपग्रह। ... .. ««« मुँक्य १००), सशिएद् १॥2)
संजरी ( सचित्न )--भनुवादक, . पं० रूपनारायणजी पांडेय कविरत्न ; बेंगला के क्व्घ-प्रतिष्ठ मढ्प-लेखकों की लवश्रष्ठ और चमस्कार- पूर्ण, शिक्षा-प्रद् गल्पों का अनूठा संग्रह ।.... मृक्य १|), $॥॥) ३, नाटक कृष्णुकुमारी ( सचित्र )--ल्लेजक, पं० रूपनारायणजी पांडेय कविरत्न ; सद्ठाकवि साइक्रेल मघुसूदनदत्त के सघसे बढ़िया ऐति- हासिक नाटक “क्ृष्णकुमारी” का अनुवाद । मृत्य १), १0) जयद्र॒थ-बध---लेखक, पं० गोकुलचद्र शर्मा एस्ू० ए०; गद्य- पशथ्सय वीर-रस-पूर्ण नाटक । घंबई में इट्रेंस में कोस। मूल्य ॥), १८2) दुर्गावती ( सचित्र )--क्ेखक, पं० बद्रीनाथ भट्ट बी० ए०३ चीर-रस-पूर्ण भट्टजी का सर्वश्रेष्ठ नाटक । पंजाब में हिंदी-परीक्षाश्रों में कोर्स । यू० पी० में पुक्कू० ए० में कोसे।..... सूक्य १), १॥)
(३)
पूवभारत--लेखक, हिंदी के धुरंधर विद्वान “'मिश्रबंधु” ; पांडवों ओर कौरवों के रूगड़े से लेकर 'अज्ञातवास तर की कथा $ सौक्षिक नाटक ; यू० पी० में इट्रेंल में कोलं। . समृत्य ॥2), १४००) प्रबुद्धयामन--लेखफ, संगत्लाप्रप्ताद-पारितोषिक-विजेता श्रीवियोगी हरि ; श्रीक्रह्मचारी यासुनाचार्य का झ्ादुर्शचरित। मूल्य १), १॥) बुद्ध-चरित्र ( सचित्र )--अलचुवादक, प० रूपनारायण पॉडेय कबषिरत ; अपनी शाध्यात्मिक उन्नति और खसार के उपकार के लिये सांसारिक सु््खों को तिलांजलि देकर किस प्रकार महात्मा घुद्धदेद वैराग्य में लोन हुए, इसे बतानेवाल्ना अत्यंत रोचक नाटक ; दिल्ली ओर सी० पो० से इंट्रेंस का कोर्स । द्वितीय सस्करण सृल्य ।॥), १)) चरमाला ( सचित्र )--लेखक, श्रीयुत्त पं० गोविद्वन्ञम पंत ; पौराणिक कथा के आधार पर एक भत्यव रोचक मौक्षिक नाटक |
हिंदू-विश्वविद्यालय में बी० ए० में फोर्स । मृल्य ॥2), १००)
वेणी-संहार--लेखक, प० महावीरप्रसादजी द्विपेदी ; संस्कृत के
एक प्रसिद्ध नाटक की फ्धा । ... « « मुत्य ॥2), १८)
उत्सगें--लेखक, श्रीचतुरसेन शासखी; मेवाड़ का महान् झ्ौर्सगिक
चित्र । + र ३६ मृत्य 2:), ॥॥) ७. काव्य
उषा ( सचित्र )--लेखक, स्व० श्रीशिवदास गुप्त “कुसुम”; उपा और झनिरुद्ध फी कथा मनोइर खंड काच्य में । सुक््य ॥2),१०) भारत-गीत--लेखक, कवि-सम्राद् स्व० प० श्रीघर पाठक; भारत*
संबंधी झत्युत्तम कविताश्रों का संग्रह । मृूत्य ॥5), १०5)
रति-रानी--लेखक, 'सुहृदन्नयः ; पढ़ने योग्य अ्रनोखे ढम की
निराजी रचना है ५ हे मूल्य १॥७), २) ४. साहित्य
निबंध-निचय--ज्ेखक, हिंदी के उस्क्र७ समाजोचक पढित जग-
४) चायप्रसादेबुेंदी (##/द्वित ल्लेखों और भाषणों का अपूर्द संग्रह ।
भ्रथमा या मध्यमा के लायक । की सूत्य १॥), १।॥॥) विश्व-साहित्य--छ्लेखक, श्रीपदुमन्ाज्न-्पुन्नाजाल बह़्शी बी० ए० ; संसार की सभी उन्नत भाषाओं पर समालोचना | नागपुर- युनिवर्सिटी में बी० ए*« में फोस । मृह्प १॥), २) साहित्य-सुमन--केखक, स्व० पं० बाककृष्ण सट्ट ; सादत्यिक झौर नीवि-पंबधी घुने हुए ल्लेखों का संग्रह | हिदी-साहिस्य-सम्मेक्षन
में प्रथमा से फोसे था । ... कर मूल्य ॥2), १००) साहित्य-संदर्भ--लेखक, झाचार्य प० महावीरप्रसादजी द्विवेदी | समातल्नोचनात्मक ब्लेखों का संग्रह .«.. मृक्ष्य १॥), २)
सोदरनंद-मदह्दाकाव्य--प्रसेता, स्ध्यापक रामदीत पांडेय एस्० एु०; महाकवि अश्वघोष-कृत १८ सर्गो के काव्य का कथासार |
कि रु मूल्य ॥), १) संभाषण--लेखक, प० दुलारेबाजलजी भाग॑व ; दिदी-भाषा की उन्नति इधर कैसे हुई, इसका विवेचन । .... मूह्य )), 9
हिदी--लेखक, क्खनऊ-विश्वविद्याक्य फे ह्विदो-लेक्चरार पं० यदरीनाथ भट्ट बी० एु०$ दिदी-भाषा की उत्पत्ति और उसके विकास पर विद्धत्ता-पूर्ण सिघंध । यू० पी० में एफ़्० एु० में कोस । सत्य ॥०2), १ म्ट् ६. समालोचनाएँ देव और बिहारी--ल्ेखक, प० कृष्ण विहारी मिश्र बी० ए०, एल- पुलू० थी० ; दोनो कवियो की तुछनात्मक समालोचना | विएकुछ नई चीज्ञ । सृक्ष्य १॥|), २७) हिंदी-नवरल्न--क्लेखक, हिदी-संसार के घुरंघर समाज्ञो चक “सिश्र- बंधु” , दिंदी-भाषा के सर्वोत्तम £ कवि-रत्ों के भालोचना-पूर्ण ज्ीवन- पघरित्र। परिवद्धित, संशोधित और सुसजित चतुर्थ संस्करण | लखनऊ- विश्वधिद्यालप में घी० ५० में कोल । मृर्य ४॥), $)
( ४)
७, जीवन-चरित्र प्राचीन पंडित ओर कवि--जल्लेखक, भाचाय॑ प० महावीरप्रसादजी दिबेदी। भाल्योचनाप्सक चरित्रों का संग्रह ।. मृह्य ॥-2), १०
सम्राद् चंद्रगुप्त--ओेखक, पं० बाल्मुझूंद वाजपेयी ; भारत के अथस पऐतिदासिक सन्नाट् फी सदिप्त, किंतु सवींग-पुर्ण जीवनी। सूर्य 0) सुकवि-संकीतन ( सचित्र )--ब्लेखक, साहिस्य-मद्दारथी पं ० महा- चीरप्रसादतो द्विवेदी ; सुकवियों शोर ठनके आश्रयदाताक्रों के संबंध में केस ; विद्वार में एफ़० ए० में कोस । मुल्य १)), १॥।) ८. इतिहास ईंगलेंड का इतिहास ( तान भाग, सचित्र )--लेखक, डॉ ० प्राण- नाथजी विद्याल्ंकार पी-एच० दो० ; हिंदी-साषा से सवोत्तम ईँगलेंड का इतिद्दास। सी ० पो०, यू० पी०, बिहार में ह॒ट्रेंस में कोसे । मृहम प्रत्येक भाग का $)), सजिल्द १0), दूलरा-पीसरा भाग एक जिरद में २॥) ६. अथ-शाख्र भारतोय पअर्थ-शासत्र ( दो भाग )--लेखक, सूतपू्े प्रेम-संपादर बाबू सगवानदासजी केला ; भारत को घन संबंधों समध्याञ्ों का अपूर्य विवेचन । धर के * मृक््य २॥), ३॥) १०, कृषि उद्यान ( सचित्र )--द्ेखक, श्राशकरराव जोशी एपग्रिकस्चरव् झॉफ़िसर ; बाग़बानी-सबधो अद्वितोय पुस्तक्क। सी० पा० में कोस । मुल्य १००), १॥८) कृषि सिनत्र--ज्षेखक, पं० गगाप्रसाद पांडेय एलू० ए-जी०, सुपरि- डे्रेंट एश्रिकरचर ; कृषि-घंबधी बातों का अपूर्व विवरण । मृए्य -) ११. स्वास्थ्य ओर चिकित्पा । श्कालिक चिकित्सा ( सचित्र )--छोखक, बाबू लाक्षबहादुर-
0,
2928 गक्टूरों. की) चैद्यों की मनुपस्थिति में किस प्रकार तास्कालिक 2.0) की जाय, इसका वर्णन । मूल्य १), १॥) कजी--लेखक, डॉक्टर वाबराम गर्ग ; श्वास्थ्य- संबंधी सभी बातों का विशद् वर्णन । सहिल्ञा-विद्यापीठ, प्रयाग में फोस। .... ४ म मूल्य १), १॥) १२ वेज्ञानिक भूकंप--क्षेखक, बाबू रामरचंद्र वर्मा ; भूकंप क्या है, क्यों भौर कैसे होता है, इसका प्रत्यंत रोचक वर्णन । ... सृत्य ॥2), 45) मनोविज्ञान--ल्लेखक, प्रिसिपत्न प० चंद्रमौक्षि सुकु्ष एस्० ए०, एलू०- दी०, मनोधिकारों भौर मानसिक बृत्तियों का सूचम परिचय | मू० ॥|), १) १३. नवयुवकोपयोगी जीवन का सद्व्यय--अनुवादक, श्रीह्रिभाऊ उपाध्याय, संपा- दुक स्यागभूमि; प्रसिद्ध पुस्तक “परएणाएाए 0! पिप्राशथा 486” का सहत्त-पूर्ण श्रनुवाद । ........... मूल्य १), १॥७ पाली प्रवोध--ल्लेखक, प० श्राद्यादत्तजी ठाकुर एस्र० ए०, काब्य- तोथ; थोड़े डी दिनों में पाल्ली-भाषा सीखने की कंजी। सूक््य १), १॥) सुख तथा सफल्तता--छुस्तक के नास से विषय स्पष्ट । मूल्य )) नीति-रत्-माला--चरित्र-सुधार-सधंधी अनेक मद्ृत्त्व-पूर्ण बातों का रोचक विवरण । हक ४ सूल्य )) १४. कन्याओ के लिये देवी पावती (सचित्र )--लेखक, मुंशी ज़हरबखरू्श हिंदी कोविद ; औपन्यासिक ढंग से देवी पाती का सबके पढ़ने योग्य आदर्श जीवन-चरित । ५ ४ मृक्ष्य ॥!), १।) नत्न-दमयंती ( सचित्र )--लेखक, मुंशी ज़हूरबऱश हिंदोको विद; झौपन्यासिक ढग से नत्बन-दमयंती का रोचक भाषा में जीवन-चरित । मूल्य ॥0), १))
( ७५)
। भारत की विहुषी नारियाँ--संपादिका, श्रीमती कृष्णकुमारी; ४० के लगभग विदुषो नारियों के ज्ञीवन-चरिस । .... मृलष ॥) वनिता-विज्ञास ( सचित्र )--लेखक, भूतपूर्व सरस्वती-पपादर 'पं० सहावीरप्रसादजी हिवेदी ; देशी-विदेशी स्थियों की शिक्षाप्रद भौर 'मनोरंजक जोवनियाँ।... गा सृक्ष्य ॥) सती सीता ( सचित्र )--लेखक, सुंशी ज्हूरयख़्श हिदी-कोविद ; महारानी सी सीता के जीवन का उपदेश-पूर्ण घर्णन। मूल्य १॥), २) देवी शकूृंतला--लेखक, श्रीह्रिप्रसाद द्विवेदी ; आदर्श प्रेमिका शरकृंतत्ञा का मनोरम चरित । « « मृत्य ॥:2), ॥2), १2) १४, बच्चो के लिये
इतिहास की कहानियाँ ( सचित्र )--लेखक, सुंशी ज़हूरबख़्श दिदी-कोविद ; संसार के प्रसिद्ध पुरुषों के श्त्लोकिक साहस, वीरता, दया आदि की सचिन्न कथाएँ । मा हर मृक्य 0) कागजी करतब ( सचित्र )--ज्लेखक, भ्रीयुत जी० पी० श्रीवास्तव बी० ए०, एल्-एलू० बी० ; गणित-जेसे गहन विषय पर अत्यत सनोरंजक पुश्तक । फााज़ के खिलौनों से यणित की पढ़ाई | सृक््य क्यभग 0) बाल-नीति-कथा ( दो भाग )--मूज्-लेखक, श्रीयुत ए० बी० भू व एम्रू० ए०, एल-एल्० घी०, प्रो० वाहइसचांसलर हिदू-विश्व-यिद्याक्षय अनुवादक, प० बद्रीनाथ भट्ट बी० ए७ प्रत्येक देश भौर घर्म की बाज्ञको पयोगी शिक्षा की फहानियाँ | दो भागों में । गुरुकुज्ञ कांगड़ी । मृ्य २॥), ३॥)
भारत के सपूत ( सचित्र )-लेखक, मुशी ज़हरवइ़ूश हिंदी- कोविद ; भारत के महान् ऐतिहासिक पुरुषों के ज्ीचन फो सचित्र, रोचक कहानियाँ । बह ««.. मृत्य ॥), १) भू-कवच ( सचित्र )--भूगोल के वैज्ञानिक साग की सरल भौर सुंदर भाजोचना । डे मूल्य क्षगभग १)
/ ह् (5)
:अर्थालरिय्र्त की कहानियाँ ( सचित्र )-- सृक्ष्य ॥2), १८) वीर ( सचित्र )--लेखक, पं जगश्नाथश्रसाद चतुर्वेदी; सुप्रसिद्ध अगरेज्ञी-वपन््पास ॥)07 0पांड्र008 का ( जो संसार के १२ उपन्यासों में से एक है ) भजुवाद।.... मूक्य॥), $9 युधिष्ठिर--ज्ञेसक, भ्रीकृष्णयोपात्ष माथुर ; घर्मराज युधिह्िर का भध्यंत रोचक भाषा में जीवन-चरित सारे महाभारत फी कभा। मृक्ष्य ॥), भ) १६, प्राचीन साहित्य ओर इतिहास मतिराम-प्रंथावज्ञी--सपादक, पं० कृष्णविह्दारी मिश्र थी० ए०, एज एल ० यी०; महाकधि मतिराम के अंथों का टिप्पणियाँ, शब्दाथे, नोट और शाल्नोचना-सहित सुंदर संस्करण | मूल्य २॥), ३) मिश्रब॑धु-विनोद् ( तीन खेंड )--लेखक, पं० गणेशविद्दारी मिश्र, माननीय रा० ब० पं० श्यामविद्ाारी मिश्र पएुस्ू० ए० भौर रा० ब० पृं० शुकदेवविद्वारी मिश्र बो० ए०; प्राचोन और नवीच सभी रूवियों और लेखकों की जीवनियों का उत्तम संग्रह ; संशोधित और संवर्धित द्वितीय संस्करण ।
प्रथ्म खेड मूल्य २), २॥>) द्वितीय खद् 9 हे) ३॥) तृतीय खड़ 9 है); २॥) चतुर्थ खंड ( आये निकव्वेगा )
विहारी-रल्लाकर--प्रणेता, चजभाषा-सादित्य के पारदर्शी विद्वान घाव जगन्नाथदास "रत्नाकर” बी० ए०; सद्दाकवि बिहारी फी सतसईं संशोधित भौर उस पर अहितीय हिंदी-भाष्य । बी० ए० और एस० घु० में कोल । न हु 45५ .«.. मूल्य ९)